Thursday, September 8, 2011

भरम उसकी शराफत का न खुल जाए वो डरता है /aadil rasheed

भरम  उसकी  शराफत  का  न  खुल  जाए  वो  डरता  है
सहारा  ले  के  गैरों  का  वो  मुझ  पर  वार  करता  है

समझ  में  आ  सकेगा   किस  तरह  ये  मसअला यारो 
जो  शब्  का  क़त्ल  होता   है  तो  इक  सूरज  उभरता  है


कोई  तद्फीन  हो  घर  में , किसी  अपने की  शादी  हो
ये  मत  पूछो  वो  दिन  परदेस  में  कैसे  गुज़रता  है

मिरे  अशआर  कुछ  लोगों  को  खुद  पर  तन्ज़  लगते  हैं 
जहाँ  पर  गड्ढा  होता  है  वहीँ  पर  पानी  मरता  है

तद्फीन = मुर्दा दफ्न करना, अंतिम क्रिया
अशआर = शेर का बहुवचन 
शब् = रात 

तन्ज़ =व्यंग   

bharam uski sharafat ka na khul jaaye wo darta hai
sahara le ke gairon ka wo mujh par waar karta hai

samajh men aa sakega kis tarah ye masala yaaro
jo shab ka qatl hota hai to ik sooraj ubharta hai


koi tadfeen ho ghar men, kisi apne ki shaadi ho
ye mat poochho wo din pardes men kaise guzarta hai

mire ashaar kuchh logon ko khud par tanz lagte hain
jahan par gaddha hota hai wahin par pani marta hai






3 comments:

जनविजय said...

आपकी इस ग़ज़ल के पहले दो शेर उम्दा हैं, आदिल भाई।

देवमणि पाण्डेय said...

ग़ज़ल के ज़रिए अपने वक़्त को साकार करने की अच्छी कोशिश है।

बलराम अग्रवाल said...

कोई तद्फीन हो घर में, किसी अपने की शादी हो
ये मत पूछो वो दिन परदेस में कैसे गुज़रता है
मिरे अशआर कुछ लोगों को खुद पर तन्ज़ लगते हैं
जहाँ पर गड्ढा होता है वहीँ पर पानी मरता है
आदिल भाई, पहले दो अशआर पर अनिल जनविजय ने मुहर लगा दी, बाकी दो पर मैं लगा देता हूँ। मेरे तईं पूरी ग़ज़ल बेहतरीन है। मज़ा आ गया।