Monday, September 12, 2011

फैज़ अहमद फैज़ कि ज़मीन में एक तरही ग़ज़ल/faiz ahmad faiz ki zameen me ek tarahi ghazal/aadil rasheed


फैज़ अहमद  फैज़  कि  ज़मीन  में  एक  तरही ग़ज़ल 

जो  खून  ए  दिल  में  डुबो  ली  हैं  उँगलियाँ  मैं  ने  
लिखी  है  तब  कहीं  ज़ुल्मों  की  दास्ताँ  मैं  ने  

वहीँ  वहीँ  पे सजी  पाई  कहकशां  मैं  ने  
तुम्हारा  नाम  लिया  है  जहाँ  जहाँ  मैं  ने  

कहीं  मिले  ही  नहीं  फिर  वो  पुर  सुकुं  लम्हे  
उन्हें  तलाश  किया  है  कहाँ  कहाँ  मैं  ने  

मुझे  ये  दार ओ रसन उस का ही तो तोहफा है 
रखीं थी  नब्ज़  ए  ज़माना  पे  उँगलियाँ  मैं  ने  

हवा  के  साथ  में  कुछ  फिक्रें  भी  चली  आईं
ज़रा  सी  जेहन  की  खोली  जो  खिड़कियाँ  मैं  ने  

मिरा  वजूद  बिखर  जायेगा  पता  था  मुझे 
मगर  गुरूर  की  कर  दी   हैं  धज्जियाँ  मैं  ने  

ग़ज़ल  का  लहजा  मिरा  यूँ  भी  तल्ख़  है  आदिल 
पढ़ी  है  हजरते साहिर  की  "तल्खियाँ " मैं  ने 

दार ओ रसन= फांसी का फंदा,सलीब,फांसी का तख्ता
कहकशां= आकाश गंगा ,glaxy 
तल्ख़= कड़वा 
 तल्खियाँ साहिर लुधियानवी के ग़ज़ल संग्रह का नाम है

आदिल रशीद  

فیض احمد فیضؔ کی زمین میں ایک طرحی غزل

جو خون دل میں ڈبولی ہیں انگلیاں میں نے
لکھی ہے تب کہیں ظلموں کی داستاں میں نے

وہیں وہیں پہ سجی پائی کہکشاں میں نے
تمہارا نام لیا ہے جہاں جہاں میں نے

کہیں ملے ہی نہیں پھر وہ پر سکوں لمحے
انہیں تلاش کیا ہے کہاں کہاں میں نے

مجھے یہ دار و رسن اس کا ہی تو تحفہ ہے
رکھی تھیں نبض زمانہ پہ انگلیاں میں نے

ہوا کے ساتھ میں کچھ فکریں بھی چلی آئیں
ذرا سی ذہن کی کھولیں جو کھڑکیاں میں نے

مرا وجود بکھر جائے گا پتہ تھا مجھے
مگر غرور کی کر دی ہیں دھجیاں میں نے

غزل کا لہجہ مرا یوں بھی تلخ ہے عادلؔ 
پڑھی ہے حضرت ساحرؔ کی’’ تلخیاں‘‘ میں نے 

عادل رشید

faiz ahmad faiz ki zameen me ek tarahi ghazal

jo khoon e dil me dubo li hain ungliyan main ne 
likhi hai tab kahin zulmon ki dastan main ne 

wahin wahin pe saji payi kehkashan main ne 
tumhara nam liya hai jahan jahan main ne 

kahin mile hi nahin phir wo pur sukun lamhe 
unhen talash kiya hai kahan kahan main ne 

mujhe ye dar o rasan is baat ka hi to tohfa hai
rakhi thi nabz e zamana pe ungliyan main ne 

hawa ke saath me kuchh fikren bhi chali aayin
zara si zehn ki kholi jo khidkiyan main ne 

mira wajood bikhar jayega pata tha mujhe
magar guroor ki kar di hain dhajjiyan main ne 

ghazal ka lehja mira yun bhi talkh ha aadil
padhi hai hazrat e SAHIR ki "talkhiyan" main ne 
aadil rasheed


7 comments:

pran sharma said...

TARAHEE MISRE PAR AAPNE GAZAL KHOOB
KAHEE HAI .BADHAAEE.

नीरज गोस्वामी said...

वहीँ वहीँ पे सजी पाई कहकशां मैं ने
तुम्हारा नाम लिया है जहाँ जहाँ मैं ने

सुभान अल्लाह...आदिल भाई बेहद खूबसूरत ग़ज़ल और बहुत ही उम्दा शायरी है आपकी...मेरी तहे दिल से दाद कबूल करें ...

नीरज
http://ngoswami.blogspot.com

डॉ. जेन्नी शबनम said...

bahut khoobsurat ghazal, daad sweekaaren.

Amrita Tanmay said...

Behtareen gajal ke liye shukriya

परमजीत सिँह बाली said...

bahut Behtareen gajal!!

देवमणि पाण्डेय said...

शायरी की रिवयत को आपने बड़ी ख़ूबसूरती से आगे बढ़ाया है। उम्दा ग़ज़ल है, बधाई !

Sonal Rastogi said...

हवा के साथ में कुछ फिक्रें भी चली आईं
ज़रा सी जेहन की खोली जो खिड़कियाँ मैं ने

sach mein tabhi saari khidkiyaa band rakhte hai...