Monday, September 5, 2011

जो बन संवर के वो एक माहरू निकलता है /आदिल रशीद /aadil rasheed

जो बन संवर के वो एक माहरू निकलता है
 

तो हर ज़बान से  बस अल्लाह हू निकलता है
 

ये चाँद रात ही दीदार का वसीला है

बरोजे ईद ही वो खूबरू निकलता है


हलाल रिज्क का मतलब किसान से पूछो

पसीना बन के बदन से लहू निकलता है


ज़मीन और मुक़द्दर की एक है फितरत

के जो भी बोया वही  हूबहू  निकलता है



तेरे बग़ैर गुलिस्ताँ को क्या हुआ आदिल
जो गुल निकलता है बे रंगों बू  निकलता है 

आदिल रशीद 






माहरू= सुन्दर चाँद जैसे चेहरे वाला
अल्लाह हू = हे भगवान् 

रिज्क= रोजी,रोटी   

आदिल रशीद 



5 comments:

Sonal Rastogi said...

ज़मीन और मुक़द्दर की एक है फितरत
के जो भी बोया वाही हुबहू निकलता है

fir insaan dono ko kostaa hai mee hee saath aisaa kyon huaa ....waah

जनविजय said...

"तेरे बग़ैर गुलिस्ताँ को क्या हुआ आदिल
जो गुल निकलता है बे रंगों बू निकलता है"

ख़ूबसूरत बयान है।

prritiy---------sneh said...

Waah! bahut khoob kaha hai Sirji aapne.

shubhkamnayen

देवमणि पाण्डेय said...

जो बन संवर के वो एक माहरू निकलता है
तो हर ज़बान से बस अल्लाह हू निकलता है
Waah! bahut khoob

pran sharma said...

GAZAL KAA HAR SHER KHOOBSOORAT HAI.
MUBAARAK .