Wednesday, December 31, 2014

Tuesday, October 1, 2013

निभाये हम ने मरासिम यूँ बदजुबान के साथ .......आदिल रशीद nibhaye ham ne marasim yun badzubaan ke saath.. aadil rasheed


इस पुरानी ग़ज़ल को हिंदी में यहाँ पढ़ें.. आदिल रशीद

निभाए हम ने मरासिम यूँ बदजुबान के साथ
के जैसे रहता है आईना इक चटान के साथ

ज़मीं भी करने लगी अब दुआ किसान के साथ 
के दरया बहने लगा खतरे के निशान के साथ

है तेरे हाथ में अब लाज उसकी रब्बे करीम
परिंदा शर्त लगा बैठा आसमां के साथ

हम ऐसे लोग भला कैसे नींद भर सोयें
के जाग उठती हैं फिकरे मियाँ अज़ान के साथ

कहीं ये बढ़ के मेरा हौसला न क़त्ल करे
तभी तो जंग छिड़ी है मेरी थकान के साथ

वो जिसके सामने दरया ने नाक रगडी है
हमारा रिश्ता है उस आला खानदान के साथ

गरीब होने से तहजीब मर नहीं सकती
वो चीथड़ो में भी रहता है आन बान के साथ
 

wo mujhe janta hi kitna tha ... aadil rasheed वो मुझे जानता ही कितना था ... आदिल रशीद

full ghazal
प्यार का सिलसिला ही कितना था
शब् को मैं जागता ही कितना था

pyaar ka silsila hi kitna tha 
shab ko mai'n jagta hi kitna tha

तुझको अफ़सोस मैं ने कुछ न कहा
और तू भी खुला ही कितना था

tujhko afsos mai'n ne kuch na kaha
aur tu bhi khula hi kitna tha

बेवफाई का क्या करे शिकवा
तू हमारा हुआ ही कितना था

bewafayee ka kya kare'n shikwa
tu hamara hua hi kitna tha

मैं ने ये कह के दिल को समझाया
वो मुझे जानता ही कितना था

mai'n ne ye keh ke dil ko samjhaya
wo mujhe janta hi kitna tha

हँस के देखा पिघल गया ज़ालिम
फिर वो रूठा हुआ ही कितना

hans ke dekha pighal gaya zaalim
phir wo rutha hua hi kitna tha

आज बर्बाद हूँ तो ग़म क्यूँ है
तू मुझे टोंकता ही कितना था

aaj barbaad hu'n to gham kyu'n hai
tu mujhe tokta hi kitna tha

ऐसे वैसों के हाथ आ जाता
दाम मेरा गिरा ही कितना था

aiso'n waiso'n ke hath aa jata
daam mera gira hi kitna tha

बे सबब ही उदास हो आदिल
मिलना जुलना हुआ ही कितना था

besabab hi udas ho aadil
milna julna hua hi kitna tha
 —

Thursday, September 5, 2013

वो लड़की एक कविता एक नज़्म ...wo ladki ek nazm ..aadil rasheed


वो लड़की क्या बताऊँ तुमको कितनी खूबसूरत थी
बस अब ऐसा समझ लीजे परी सी खूबसूरत थी

हवा के जैसी थी चंचल,नदी के जैसी थी निर्मल 
महक उसके बदन की ज्यूँ महकता है कोई संदल

सुनहरी ज़िंदगी के थे हसीं गुलदान आँखों में
बसाये रखती थी साजन के जो अरमान आँखों में

वही जो आईने के सामने सजती संवरती थी
वो शर्मीली सी इक लड़की जो खुद से प्यार करती थी

वही जो आईने के सामने घूंघट उठाती थी
उठा कर अपना ही घूँघट जो खुद से ही लजाती थी

वही जो फूल के जैसे ही हंसती खिलखिलाती थी
ये दुनिया खूबसूरत है वो हर इक को बताती थी

ये दुनिया खूबसूरत है वो अब इनकार करती है
वो लड़की आईने के सामने जाने से डरती है

ये शतरूपा की बेटी है,यही हव्वा की बेटी है
यही ज़ैनब, यही मरयम, यही राधा की बेटी है

जिसे अल्लाह ने पैदा किया है मर्द की ख़ातिर
वो कितने दुःख उठाती है उसी हमदर्द की ख़ातिर

सता कर जो भी मासूमों को खुद को मर्द कहते हैं
जो इन्सां हैं वो ऐसे लोगों को नामर्द कहते हैं

अब इन वहशी दरिंदो को यूँ गर्क़ ए आब कर दीजे
सज़ा तेज़ाब की दुनिया में बस तेज़ाब कर दीजे

आदिल रशीद

ग़र्क़ ए आब = पानी में ग़र्क़ करना, पानी में डुबो देना
आदिल =न्याय करने वाला 
acid victim poem aadil rasheed

इस रचना को बिना मेरी अनुमति कहीं प्रकाशित करना अनुचित है ...आदिल रशीद
+91 9811444626
 — with Babita Solanki and 23 others.


Monday, July 22, 2013

"गुरु पूर्णिमा"........ आदिल रशीद aadil rasheed

खुद से चल कर ये कहाँ तर्ज़े सुखन आया है 
पाँव दाबे हैं बुजुर्गों के तो फन आया है (मुनव्वर राना)

"गुरु पूर्णिमा"  

बहुत से लोगों के लिए ये एक नया नाम होगा।
बहुत से लोगों ने इसे सुना होगा लेकिन इसे समझा नहीं होगा।
और बहुत से लोगों के लिए ये एक अज़ीम दिन है ये दिन है अपने गुरु के नाम का ज़िक्र करने और अपने अकीदत अपनी निष्ठां का इज़हार करने का 
हर इंसान का पहला गुरु उसकी माँ होती सो मेरी भी वही है. हर आदमी का दूसरा गुरु उसका पिता होता है सो मेरे वालिद (पिताजी) मरहूम (स्व.) अब्दुल रशीद मेरे दुसरे गुरु हैं.  उनसे मैं ने जीवन के उतार चढ़ाव के बारे में तो सीखा ही सीखा अरूज़ (फने शायरी) की भी बारीकियां सीखी वो हमेशा कहा करते थे के
 " अरूज़ इतना सीखो के अपना काम चला सको दोस्तों की मदद कर सको लेकिन अरूज़ उतना मत सीखो के अपने दोस्तों को दुश्मन बना लो "

मेरे अन्य गुरु जो रहे जिन्होंने मुझे कलम पकड़ना सिखाया अक्षर ज्ञान दिया क ख ग घ सिखाया मेरे लिए वह सभी अज़ीम थे, हैं, और रहेंगे।

स्कूल से कोलेज तक उन तमाम गुरुओं मे से एक श्री नंदन जी सुना है कालागढ़ से आकर आजकल गाज़ियाबाद में कहीं रहने लगे हैं उनकी तलाश जारी है अगर कोई इस में मेरी मदद कर सके तो मैं आभारी रहूँगा।
शायरी में पिताजी स्व.अब्दुल रशीद जो आलोचक थे के बाद मेरे प्रथम गुरु मरहूम महबूब हसन खां नय्यर तिलहरी रहे जो एतबारुल मुल्क हजरते @दिल शाहजहांपुरी के शागिर्द थे और दिल शाहजहांपुरी महान शायर "अमीर मीनाई" के शागिर्द थे.

मुझे हमेशा ही इस बात पर फख्र रहा के दिल शाहजहांपुरी से होता हुआ मेरा रिश्ता अमीर मीनाई तक जाता है और मुझे अमीर मीनाई का परपोता होने का शरफ हासिल है. 

महबूब हसन खान नय्यर ने ही अपने जीते जी मुझे मेरे तिलहर के ही दूसरे उस्ताद शायर स्व. ताहिर तिलहरी का शागिर्द बनवा दिया था (इस का पूरा विवरण मेरे द्वारा संकलित मेरे गुरु के ग़ज़ल संग्रह " आख़री परवाज़ " में देखा जा सकता है जिसमे मैं ने अपने दोनों गुरुओं के विषय में अपने लेख "ये तुम्हारा ही करम है दूर तक फैला हूँ मैं " में लिखा है ) 
मुझे अपने शायरी के दोनों उस्तादों पहले उस्ताद महबूब हसन खान नय्यर तिलहरी और दुसरे उस्ताद ताहिर तिलहरी पर सदा फख्र रहा है और रहेगा आज के दिन इन सबको मैं अपना सलाम पेश करता हूँ मैं आज जो कुछ भी बन पाया हूँ  ये सब मेरे गुरुओं की और उस्तादों की मेहनतों का और मुहब्बतों का नतीजा है. 

नोट :- सिखाया तो मुझे मेरे दोस्तों और विरोधियों ने भी धोके देकर बहुत कुछ मैं उनका आभारी तो हूँ और ज़िंदगी भर शुक्रगुजार भी रहूँगा लेकिन उन को उस्ताद या गुरु लिखकर "गुरु" जैसे अज़ीम और महान लफ्ज़ की बेइज्ज़ती नहीं कर सकता ……आदिल रशीद 

Friday, July 19, 2013

haayku हायकू आदिल रशीद

कम शब्दों में 
कहे अधिक बात
विधा हायकू  
(आदिल रशीद )
हायकू आदिल रशीद 

Thursday, July 18, 2013

" वो लड़की " एक नज़्म......आदिल रशीद " wo ladki " ... aadil rasheed

वो लड़की क्या बताऊँ तुमको कितनी खूबसूरत थी
बस अब ऐसा समझ लीजे परी सी खूबसूरत थी 

हवा के जैसी थी चंचल,नदी के जैसी थी निर्मल 
महक उसके बदन की ज्यूँ महकता है कोई संदल

सुनहरी ज़िंदगी के थे हसीं गुलदान आँखों में 
बसाये रखती थी साजन के जो अरमान आँखों में


वही जो आईने के सामने सजती संवरती थी​
वो शर्मीली सी इक लड़की जो खुद से प्यार करती थी

वही जो आईने के सामने घूंघट उठाती थी 
उठा कर अपना ही घूँघट जो खुद से ही लजाती थी


वही जो फूल के जैसे ही हंसती खिलखिलाती थी
ये दुनिया खूबसूरत है वो हर इक को बताती थी 

ये दुनिया खूबसूरत है वो अब इनकार करती है 
वो लड़की आईने के सामने जाने से डरती है


ये शतरूपा की बेटी है,यही हव्वा की बेटी है 
यही ज़ैनब, यही मरयम, यही राधा की बेटी है 


जिसे अल्लाह ने पैदा किया है मर्द की ख़ातिर 
वो कितने दुःख उठाती है उसी हमदर्द की ख़ातिर 


सता कर जो भी मासूमों को खुद को मर्द कहते हैं
जो इन्सां हैं वो ऐसे लोगों को नामर्द कहते हैं

अब इन वहशी दरिंदो को यूँ गर्क़ ए आब कर दीजे 
सज़ा तेज़ाब की दुनिया में बस तेज़ाब कर दीजे 

आदिल रशीद 

ग़र्क़ ए आब = पानी में ग़र्क़ करना, पानी में डुबो देना 
आदिल =न्याय करने वाला 

@इस रचना को बिना मेरी इजाज़त अनुमति कहीं प्रकाशित करना अनुचित है ...आदिल रशीद +91 9811444626,9910004373
email: aadilrasheedmansuri@gmail.com

Thursday, July 11, 2013

ek tasveeer


kalagarh me shernala no. 2


bachpan ke khel


malika e husn anarkali madhubala


yaadon ki barat ek tasveeer


roti ki fikr ne use riksha thama diya bhatka bahut wo haath me digree liye hue hindustan

roti ki fikr ne use riksha thama diya
bhatka bahut wo haath me digree liye hue
28 may ko sambhal me hue mushaire ki report hindustan me ....aadil rasheed 

roti ki fikr ne use riksha thama diya bhatka bahut wo haath me digree liye hue

roti ki fikr ne use riksha thama diya 
bhatka bahut wo haath me digree liye hue 
28 may ko sambhal me hue mushaire ki reprt dainik jagran me

haq se kaise bana lun main duri main hun aadil rasheed mansuri..

हक से कैसे बना लूँ मैं दूरी
मैं हूँ आदिल रशीद मंसूरी 

mujhe itna sa wada bhi bahut hai kahin mil jayen to pehchan loge .. aadil rasheed

मुझे इतना सा वादा  भी बहुत है
कहीं मिल जाएँ तो पहचान लोगे 

Wednesday, August 22, 2012

मुसलमानों ने गुरूद्वारे में नमाज़ पढ़ी.....आदिल रशीद

by Aadil Rasheed on Wednesday, August 22, 2012 at 2:17pm ·
मुसलमानों ने गुरूद्वारे में नमाज़ पढ़ी.....आदिल रशीद
जाने कैसी पसन्द रखता है
अपनी पलकें वो बन्द रखता है
शीन काफ निजाम  का ये शेर इस बार भी बहुत याद आया जब कल चाँद रात को बच्चों को कपडे दिलाने बाज़ार ले गया.और पूरी कोशिश करने के बाबजूद सब से छोटी बेटी अरनी सहर को हर ईद की तरह इस ईद पर भी संतुष्ट न कर सका क्यूँ की उसकी पसंद इतनी बारीक है के उसकी पसंद का सूट दिलाने में माँ बाप भाई बहिन और दुकानदार सब को पसीने आ जाते हैं बड़ी मुश्किल से किसी तरह उसे मना मुना के लगभग 5 बजे वापसी हुई और घर आ कर उसकी माँ ने और मैं ने एक लम्बी तसल्ली की सांस ली जैसे कोई जंग जीत कर आये हों.
मग़रिब (संध्या) के वक़्त चाँद रात से मुत्तालिक (सम्बंधित) 1988  की  तरही ग़ज़ल का एक शेर:
ईद का चाँद वो भी देखेंगे
आइये चल के चांदनी देखें

फेसबुक पर पोस्ट किया ही था के मोबाइल कि घंटी बजी देखा कारी साहेब का फोन है मैं समझा के चाँद रात है चाँद की मुबारकबाद देने के लिए फ़ोन आया होगा फ़ोन उठाते ही उन्होंने पूछा आप कहाँ हो मैं ने अजराहे मजाक (मजाक में )कहा हुज़ूर बेगम की पनाह में यानि घर में हूँ  वो बोले ज़रा नीचे उतर कर देखना तो फ़ोन आया है कि हमारे घर में चोरी हो गयी है मैं फ़ौरन नीचे उतर कर गया देखा भीड़ लगी हुई है उनके घर का ताला टूटा पड़ा है और घर का सामान बिखरा पड़ा है. कारी साहेब लगभग एक घंटे बाद आ गए साथ में भाभी भी थी घर की तमाम बिखरी हुई चीज़ें उठाई गयी कारी साहेब ने बताया अल्लाह का करम रहा के जेवर पैसा बगैरा सब भाभी साथ ले गयीं थी बेचारे बदनसीब चोर को सिवाय मायूसी के कुछ और हाथ न लगा होगा अलबत्ता मेरे कुण्डी,ताले, दरवाज़े और तोड़ गया

मुझे उस चोर पर बड़ा गुस्सा आया के किसी की चाँद रात और ईद ख़राब करके उसे क्या मिला कितने ज़ालिम होते हैं ये चोर अल्लाह इन्हें बड़ी सख्त सजाएँ देने वाला है तभी कारी साहेब ने एक थैले की तरफ देख कर कहा ये किस का थैला है ये हमारा नहीं है एक साहेब जो पास ही खड़े थे और ज़बान और दिमाग दोनों ही जियादा चला रहे थे बोले अगर ये  आपका नहीं है तो ज़रूर चोर का ही होगा और वो कितनी प्लानिंग से आया था बच्चों के मैले कुचैले कपडे थैले में भरकर ताकि किसी को शक न हो उनकी इस बात से अंदाज़ा हुआ के वो एक ज़हीन जासूसी दिमाग भी रखते हैं
एक साहेब ने वो थैला पलट दिया उसमे 5-6 साल उम्र की लड़की की तीन चार फ्राक थीं मैली कुचैली फटी फटाई सी मुझे तो उन मैले कुचैले कपड़ो में मजबूर बाप की गरीबी नज़र आई कितना मजबूर होगा वो बाप जो ईद पर ये घिनौना काम करने निकल पड़ा ऐसे में मुझे अपना एक शेर याद आया
मुफलिस ने अपनी बेटी से इस बार भी कहा
इस ईद की भी ईदी उधारी है मेरे पास

अल्लाह फरमाता है "हमने कुछ अमीर इसलिए बनाये के वो गरीबों की मदद करें" इस्लाम में सदका फितरा और ज़कात गरीब लोगों की मदद के लिए ही बनाये गए हैं ईद की नमाज़ से पहले अपनी जान का सदका निकालना फितरा कहलाता है वो इस बार ईद पर प्रति व्यक्ति चालीस रुपये था.
अगर आप के पास साढ़े सात तोला सोना या साढ़े बावन तोला चांदी से अधिक है या आपके पास या इनमे से किसी एक के मूल्य के बराबर रुपया है या एक साल से अधिक समय से बैंक में पड़ा है तो इस्लामी कानून के मुताबिक उस मूल्य का 2.50 प्रतिशत ज़कात आप पर वाजिब है और ज़कात का पैसा हर ईदउल फ़ित्र (रमजान के बाद आने वाली ईद) पर नमाज़ से इतना पहले गरीबों में बाँट दिया जाता है ताकि वो गरीब अपनी ईद की तय्यरियाँ कर सके अपने बच्चों के कपडे आदि बनवा सके.
ज़कात इस्लाम के पांच फ़र्ज़ (अनिवार्य नियम) कलमा ,नमाज़,रोज़ा,हज और ज़कात में से एक है जिसे हर हाल में पूरा करना ही होता है वर्ना आप मुसलमान नहीं अल्लाह इनका बड़ी सख्ती से हिसाब लेने वाला है.
चाँद रात तो साहेब चाँद रात होती है इसलिये चाँद रात को जल्दी सोने का तो कोई मतलब ही नहीं लगभग 4 बजे तक जागते रहे सुब्ह होते ही दोस्तों के फ़ोन आने शुरू हो गए बड़ा अच्छा लगता है इस दिन सब रूठे हुए एक दुसरे को कॉल करते है ईद मुबारक कहते हैं और गिले शिकवे दूर हो जाते हैं  इस्लाम में तीन दिन से जियादा किसी से नाराज़ रहने को मना भी किया गया है

नमाज़ से लौटा तो ख़बरें सुनने के लिए टी. वी  खोला तो देखा के सभी चैनलों पर अजमेर में जन्नती दरवाज़े के खुलने का लाइव टेलीकास्ट चल रहा हैं   (दरगाह अजमेर शरीफ में एक दरवाज़े का नाम जन्नती दरवाज़ा है) सभी चैनल एक दुसरे से बढ़ चढ़ कर दिखा रहे थे.
मेरे मोबाइल की घंटी बजी और मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा मेरे बचपन के दोस्त धर्मपाल सिंह धर्मी का जोशीमठ उत्तराखंड से फ़ोन था वो कालागढ़ से टिहरी वहां से उत्तरकाशी होता हुआ आजकल जोशीमठ में सरकारी जाब में है फ़ोन उठाते ही अपने खास अधिकारिक लहजे में (जिसे मैं यहाँ लिख भी नहीं सकता)  ईद की मुबारकबाद दी और बताया के तुझे तो पता है यहाँ जोशीमठ में एक भी मस्जिद नहीं है लेकिन कुछ मुसलमान रहते हैं इसलिए जुमे और ईद की नमाज़ एक मैदान में होती है  इस बार हलकी हलकी बूंदा बांदी सुब्ह से ही हो रही थी नमाज़ के समय तेज़ हो गयी और वो मैदान जहाँ नमाज़ होनी थी वहां चारो ओर पानी ही पानी भर गया  अब नमाज़ कैसे हो ऐसे में एक गुरूद्वारे के प्रबंधक श्री बूटा सिंह  ने ये आदेश दिया के गुरूद्वारे के हाल और मुसाफिर खाने को नमाजियों के लिए खोल दिया जाए और फिर ये एतिहासिक पल आया के गुरूद्वारे में नमाज़ हुई.
खबर बहुत बड़ी थी और बिलकुल सही वक़्त पर उस महाशक्ति (जिसे हम कई नामों से पुकारते हैं) ने अपना करिश्मा दिखाया जब कुछ बेवकूफ लोग मुसलमान और इस्लाम के लिए भारत को सुरक्षित नहीं बता रहे और अफवाहें फ़ैलाने का काम कर रहे हैं.
उस महाशक्ति ने एक बार फिर बताने की कोशिश की  के मैं ने तुम सब को एक बनाया था धर्म की दीवारे तो तुमने खुद खड़ी  की हैं. अब इनको गिरना भी तुमको ही होगा
 उस महाशक्ति ने ये सन्देश भी दिया के देखो मैं ने नमाज़ के लिए गुरूद्वारे के दरवाज़े खोल दिए अब इसके बाद भी तुम्हारी अक्ल तुम्हारी सोच के दरवाज़े न खुले तो तुमसे जियादा दुर्भाग्यशाली कौन है अभी भी वक़्त है समझ जाओ मैं एक ही हूँ तुम सब मेरे बन्दे हो आपस में भाई भाई हो सब एक हो.
मैं ने उसको बोला के आप इसके लिए किसी पत्रकार से सपर्क साधो इस समय इस तरह की ख़बरें समाचार पत्रों में व चैनलों पर आनी चाहिए. जब एक तरफ साम्प्रदायिक ताकतें अफवाहों का बाज़ार गर्म किये हुए हैं ऐसे में ये शुभ समाचार भारत में शांति व्यवस्था बनाये रखने में बहुत मददगार साबित होगा उसने वहां के पत्रकारों से संपर्क साधा और ये खबर अगले दिन हिन्दुस्तान में प्रकाशित हुई"
इस खबर से मुझे उतनी ख़ुशी नहीं हुई जितनी होनी चाहिए थी अगर मैं  एडिटर होता और मेरा बस चलता तो इस खबर को अखबार के फ्रंट पेज पर इतनी बड़ी हेडलाईन के साथ प्रकाशित करता के हमारे दुश्मन मुल्क अपनी अपनी राजधानी से भी इसको पढ़ लेते और कुछ सबक लेते और मेरे इस शेर के अर्थ समझ लेते जो मैं ने बड़े गर्व से कहा है:
हम जो हिन्दोस्तान से जाते
बच गए नाक कान से जाते
आपसी भाईचारे की ऐसी मिसाल सिर्फ और सिर्फ हिन्दोस्तान में ही मिल सकती है. लेकिन एक ओर से मुझे निराशा भी हुई के जब इलेक्ट्रोनिक मिडिया ने इस खबर को नहीं दिखाया हाँ सभी चैनल दिन भर अजमेर में जन्नती दरवाज़े के खुलने की खबर दिखाते रहे.जब के अगर इलेक्ट्रोनिक मिडिया इस खबर को दिखाता तो बहुत दूर तक ये बात लोगों तक पहुँचती और अफवाहों पर विराम लगता इस खबर के एक हिंदी अखबार में खबर प्रकाशित होने से क्या होगा अखबार आजकल पढता कौन है वो तो बस जैसे तैसे चल रहे हैं सरकारी विज्ञापन पर मेरी नज़र में ये खबर तो सभी चैनलों पर दिन भर रात भर हफ्ते भर दिखाई जानी चाहिए थी.
मैं सोचने लगा कहाँ हैं वो लोग जो आसाम बर्मा बैंगलोर की खबरे शेयर पे शेयर कर के हमारे भारत में ज़हर फैलाने का काम कर रहे थे, कहाँ है वो शक्तियां जो भारत के हिन्दू मुस्लिम सिख समुदाय को लडवाना चाहती हैं और भारत को यू.पी बिहार की सीमाओं में बाटना चाहती हैं विदेशी ताकतों के इशारों पर अवाम को मंदिर मस्जिद के झगडे में डालकर तरक्की के रास्ते से भटकाती हैं.
ऐसी मिसालें जो देश के हित में हों उसे लोग शेयर नहीं करते बस अफवाहों को फ़ैलाने में ही बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं लेकिन जहाँ इस तरह के घिनोने लोग हैं वहीँ शुद्ध स्वस्थ मानसिकता वाले बुद्धिजीवीयों की भी कमी नहीं है जो माध्यम का सही उपयोग करना जानते हैं फेसबुक अखबार टी.वी चैनल ब्लोगर सभी से मेरा अनुरोध है के वो अपने अपने स्तर से उन साम्प्रदायिक शक्तियों को मुंहतोड़ जवाब दें और उन्हें अल्लामा इकबाल के मशहूर ग़ज़ल "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा" जिसे अनोपचारिक रूप से भारत के राष्ट्रीय गीत का दर्जा  भी हासिल है के सही अर्थ बताये
श्रीमती इंदिरा गांधी ने जब भारत के प्रथम अंतरिक्षयात्री राकेश शर्मा से पूछा कि अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखता है, तो राकेश शर्मा ने इस ग़ज़ल के मतले का मिसरा ऊला(पहली पंक्ति) को पढ़ा "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा"

अल्लामा इकबाल ने ये ग़ज़ल 1905  में  लिखी थी और सबसे पहले सरकारी कालेज, लाहौर में पढ़कर सुनाई थी .उस वक़्त अल्लामा इकबाल लाहौर के सरकारी कालेज में पढ़ाते थे.  उन्हें लाला हरदयाल ने एक सम्मेलन की अध्यक्षता करने का निमंत्रण दिया और कहा के आपको भाषण देना है. अल्लामा इक़बाल ने भाषण देने के बजाय यह ग़ज़ल पूरी उमंग से गाकर सुनाई.
यह ग़ज़ल हिन्दोस्तान से प्रेम का बेहतरीन नमूना है और अलग-अलग धर्मों  के लोगों के बीच भाई-चारे की भावना बढ़ाने को प्रोत्साहित करती है.
1950 में मशहूर सितार वादक पण्डित रवि शंकर ने इसे सुरों से सजाया और इस कालजयी रचना की धुन को भी अमर कर दिया.कमाल देखिये इसको लिखा एक मुसलमान ने सुरों से सजाया ब्राह्मण ने और गाया इसको पूरे भारत के अलग अलग धर्मों के लोगो ने मेरी नज़र में ये अखंड भारत के गंगा जमुनी तहज़ीब को दर्शाती हुई महान रचना है
पेश है उसी कालजयी ग़ज़ल का मतला और शेर:
सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा ।
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसताँ हमारा ।।
मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना ।
हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्ताँ हमारा ।।
जय हिंद जय भारत
आदिल रशीद

आदिल रशीद 



Monday, July 23, 2012

apna shaoor apni ana kho chuke hain ham aadil rasheed

apna shaoor apni ana kho chuke hain ham
ab jaagna padega bahut so chuke hain ham

ab raah tak rahe hain ababeel aayengi
hasil jo tha dua me asar kho chuke hain ham

ab kaun badh ke ham ko gale se lagayega
kaante to apne charo taraf bo chuke hain ham

ab to hamare honto ko muskaan bakhsh de
ab to naseeb se bhi siva ro chuke hain ham

shikwa agar karen to karen kis zubaan se
ik haq tha apne pas jise kho chuke hain ham

ehsaas-e- kam tari ka hue hain shikar yun
ab ehtjjaj tak ka hunar kho chuke hain ham

marne ke baad den to tira hi hisaab den
ta umr zindagi to tujhe dho chuke hain ham

kab tak naseeb saath hamara nibhayega

ab itni baar pa ke tujhe kho chuke hain ham

ab zulm ho rahe hain to isme galat hai kya
"aadil" kabhi ki samt-e-safar kho chuke hain ham

aadil rasheed tilhari -22-12-2000



Tuesday, July 17, 2012

'' बा उसूल ''


बेतरतीब बढ़ी दाढ़ी, बिखरे बाल, पैरों में हवाई चप्पल, मैले कुचैले  कपड़े, कंधे पर अंगोछा डाले किसान सा नज़र आने वाले उस  आदमी का डी. टी. सी. बस से उचक उचक कर बाबाबाहर देखना ये बता रहा था के वो  शायद पहली बार दिल्ली आया था.उसके साथ लगभग दस साल की एक अपाहिज लड़की थी उसके हाथ में एक्सरे  और एम. आर. आई. के  पुलंदे से ये एहसास हो रहा था कि बच्ची के ठीक होने की उम्मीद उस  मजबूर बाप को इस महानगर में ले आई थी. अचानक वह उठा और अपनी बच्ची को कांधे  पर उठाया  दूसरे हाथ से एम. आर. आई. का पुलंदा उठा कर वो वह ड्राईवर के  पास पहुँचा और अपने  भोले भाले देहाती अंदाज़ में ड्राईवर से इल्तिजा के स्वर में बोला,'' हम दुकन्वा  पहचान लिए हैं. तनिक  गेटवा खोल दीजिए हमें उतरना है'' ड्राइवर ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और हिकारत भरे लहजे में जवाब दिया'' गेट लाल बत्ती (red light) पर नहीं खुलता बस स्टाप पर खुलता है वहां  उतरना वह मजबूर बाप गिदगिड़ा कर बोला " दया करें बाबू बच्ची अपाहिज है और मैं  कमजोर बहुत चलना पड़ेगा '' ड्राइवर ने उसकी ओर देखे बिना लापरवाही से कहा लाल बत्ती पर गेट खोलने पर चालान हो जाता है हमारे भी कुछ उसूल कुछ नियम हैं जिनसे हम बंधे हैं हम उन्हें तोड़ नहीं सकते'' बस चल पड़ी काफी दूर जाने के बाद बस स्टाप आया बस रुकी और मजबूर बूढा बाप  आँखों में आँसू लिए उतर गया. बस फिर चल पड़ी यूसुफ सराय के बाद हौज खास के पास जीन्स और टॉप पहने एक लड़की जिसके वी कट खुले बाल उसके कंधे पर अठखेलियाँ कर  रहे थे उठ कर दरवाजे की ओर बढ़ी और उसने अपने बड़े से धूप के चश्मे को माथे की तरफ सरकाते हुए ड्राईवर की तरफ  'केवल' मुस्कुराते हुए देखा ड्राईवर की  उंगली गेट खोलने वाला बटन दबा चुकी थी गेट खुल चुका था लड़की मुस्कुराती हुई 'लाल बत्ती' पर ही  बस से उतर चुकी थी और मैं उस ''बा उसूल " आदमी को देखता रह गया..... आदिल रशीद-10-10-2007  e-mail:
aadilrasheed.tilhari@gmail.com


मिसले शददाद हो गए तुम भी 
यानी नक्काद हो गए तुम भी 

कल इसी लफ्ज़ के मुखालिफ थे (लफ्ज़ के मुखालिफ =शब्द के विरोधी  )
आज जल्लाद हो गए तुम भी 

मुझ्को बर्बाद देखने के लिए 
देखो बर्बाद हो गए तुम भी 

मैं भी मर कर जहाँ से छूट गया 
और आजाद हो गए तुम भी 

तुम भी मिसरे दुरुस्त करने लगे
अच्छा उस्ताद हो गए तुम भी 

शददाद एक ऐसे राजा का नाम है जो हठधर्मी था खुद को खुदा कहलाता था यानी जो उस ने कहाँ वो सत्य बाकी सब झूठ,  इसी लिए मैं ने मिसले शददाद यानी शददाद जैसा  कहा के नक्काद (आलोचक) भी अपनी बात को बडा रखता है

Thursday, July 12, 2012

Tuesday, July 10, 2012

sahil sahri par mera mazmoon rajasthan ke prmukh akhbaar ugpaksh me ..aadil rasheed

sahil sahri par mera mazmoon rajasthan ke prmukh akhbaar ugpaksh me ..aadil rasheed


Monday, July 9, 2012

सफ़र सफ़र है मेरा इंतज़ार मत करना safar safar hai mera intzar mat karna sahil sehri sahil sahri

सफ़र सफ़र है मेरा इंतज़ार मत करना.....साहिल सहरी


मैं लौटने के इरादे से जा रहा हूँ मगर 
सफ़र सफ़र है मेरा इंतज़ार मत करना
हिंदी उर्दू साहित्य मे दिलचस्पी रखने वाला शायद ही कोई  शख्स हो जिस ने ये शेर न सुना हो ये मशहूर शेर साहिल सहरी नैनीताली का है जिन्होंने कभी दिमाग  का कहना नहीं माना हमेशा दिल का कहना ही किया उसी दिल ने आज उनके साथ बेवफाई की और धड़कन बंद हो जाने के सबब आज सुब्ह ८.30 बजे  उनका निधन हो गया... अल्लाह उन्हें जन्नत मे ऊंचा मुकाम अता फरमाए
साहिल सहरी का जन्म 4 नवम्बर 1949  को नैनीताल में हुआ उनका असली नाम रहीम खान था उनके पिता रहमत अली खान भी एक उस्ताद शायर थे और अहकर देहलवी तखल्लुस फरमाते थे क्युनके उनकी माँ और साहिल सहरी की दादी पुरानी दिल्ली के एक इल्मी अदबी बाजौक घराने से तआल्लुक रखती थी इसलिए उन्होंने अपने तखल्लुस में नैनीताल मे पैदा होते हुए भी दिल्ली की निस्बत को प्राथमिकता दी इस तरह ये बात दलील के साथ कही जा सकती है कि साहिल सहरी को शायरी का ज्ञान बिरासत में मिला और शायरी उनके खून में शामिल थी.
साहिल सहरी के लिए ये बात भी कही जाती थी  के जो लोग उनके पास उठे बैठे तो शायर हो गए तो भला साहिल सहरी साहिब की पत्नि उनके प्रभाव से कैसे बचतीं साहिल सहरी की पत्नि निशात साहिल ने भी उनकी रहनुमाई में बड़ी पुख्ता शायरी की है 
उनकी औलादों में 6  बेटियां 1 बेटा है. एक बहुत पुरानी कहावत है के मछली के बच्चों को तैराकी सीखनी नहीं पड़ती ये हुनर उनमे पैदाइशी होता है उनकी औलादों में भी शायरी के गुण जन्मजात पाए गए और उनकी बेटियों ने वालिद के नक़्शे क़दम पर ही चलते हुए हमेशा मेआरी शायरी की उनकी एक बेटी तरन्नुम निशात ने अपने मेंआरी कलाम से अदब की खूब खिदमत की और शादी के बाद अपने परिवार को समय देने के  कारण खुद को मुशायरों से दूर कर लिया लेकिन शेर अब भी कहती हैं. उनकी छोटी बेटी नाजिया सहरी इस समय  मुशायरों में बहुत कामयाब शायरा है. तथा पूरे भारत के कवि सम्मेलनों और मुशायरों उनको उनको पसंद किया जाता है.
मरहूम साहिल सहरी से मेरी बड़ी कुर्बत थी वो मुझ से बहुत मुहब्बत करते थे हमेशा मेरा होसला बढ़ाते थे.और जब देहली आते तो ज़रूर मुलाक़ात करते.उनसे मेरी  पहली मुलाक़ात तब हुई थी जब मैं ने और हामिद अली अख्तर ने एक कुल हिंद मुशायरा व कवी सम्मलेन "एक शाम डाक्टर ताबिश मेहदी के नाम " दिल्ली में कराया था जिसमे वो अपने बेहद अज़ीज़ शागिर्द जदीद लहजे के मुनफ़रिद शायर व् कवि और उत्तरांचल पावर कारपोरेशन में  DGM  के पद पर कार्यरत जनाब इकबाल आज़र के साथ तशरीफ़ लाये थे जिन पर वो बहुत फख्र करते थे क्यूँ कि  इकबाल आज़र साहेब में एक खास बात ये है के वो ब यक वक़्त उर्दू और हिंदी भाषा में शायरी करते हैं जो के एक व्यक्ति का दायें और बाएं हाथ से लिखने जैसा  बेहद कठिन काम है लेकिन इकबाल आज़र  साहेब उसको उतनी ही आसानी से कर लेते है जितनी आसानी से नट रस्सी पर सीधा चलता है.
साहिल सहरी साहब ने मुझे बहुत से मुशायरों में खुद भी बुलाया और  दूसरी जगह भी प्रमोट किया ये कह कर के "अच्छी शायरी  को अच्छे  लोगों तक पहुंचना चाहिए ये हम अदीबों की ज़िम्मेदारी है मैं स्वयं  भी और मेरी टूटी फूटी शायरी भी उनके इस सच्चे जज्बे की हमेशा शुक्रगुज़ार रहेगी.स्वर्गीय साहिल सहरी  बड़े साफ़ दिल बड़ी साफ़ साफ़ बात करने वाले इंसान थे किसी तरह की मसलहत {diplomacy}और गीबत {निंदा} को बिलकुल पसंद नहीं करते थे 
एक बार उनका यही मिसरा " सफ़र सफ़र है मेरा इंतज़ार मत करना" तरह के तौर पर दिया गया जिस पर मैं ने कुछ यूँ गिरह लगायी जो उनके इस बड़े शेर से बिलकुल उलट थी के 
ये बात सच है मगर कह के कौन जाता है 
" सफ़र सफ़र है मेरा इंतज़ार मत करना" आदिल रशीद{2005}
 कुछ "अजब से लोगों ने"  कुछ "अजब से अंदाज़" में उनको ये शेर सुनाया और उनको "कुछ अजब " से मतलब समझाने चाहे उन्होंने उन्हें कोई भी उत्तर दिए बिना जेब से मोबाइल निकाल कर उन  के सामने ही मुझे फ़ोन लगाया और आदत अनुसार हँसते हुए कहा "बरखुरदार मुबारक हो हमारा रिकॉर्ड तोड़ दिया" मैं सटपटा गया और घबराते हुए मैं ने कहा  "उस्ताद मैं समझा नहीं" तो उन्होंने हँसते हुए बगैर किसी का नाम लेते हुए कहा " कुछ लोग मुझे  तुम्हारा ये शेर सुना रहे हैं जो तुमने मेरे मिसरे पर मिसरा लगाया है मैं ने सोचा के तुमने अच्छा काम किया है तो इनके सामने ही तुम्हे मुबारकबाद दे दूँ" 
मेरे उस वक़्त भी और बाद में भी कई कई बार इल्तिजा {प्रार्थना}करने पर भी उन्होंने मुझे उन "अजीब से लोगों "के नाम कभी नहीं बताये और अब अगर वो उनके नाम बताना भी चाहें तो बता नहीं सकते क्यूँ के रूहें बोलती नहीं उनको  अपनी बात कहने के लिए जिस्म  की ज़रुरत होती है.और जिस्म तो आज सुपुर्दे खाक हो गया 
मैं ने जब-जब उनसे ऐसे "अजीब आदमी नुमा प्राणियों" के विषय में बात की उन्होंने यही कहा के आदिल मियां तुम अपना काम {साहित्य सेवा} करते रहो इस साहित्य के सफ़र में तुमको अभी बहुत से अजीब अजीब प्राणी मिलेंगे 
साहिल सहरी भी पेशे से घडी साज़ थे और मैं भी पेशे से घडी साज़. एक बार जब  मैं ने उन्हें अपना ये शेर सुनाया 
''औरों की घड़ियाँ हमने संवारी हैं रात दिन 
और अपनी इक घडी की हिफाज़त न कर सके"
तो उनकी आँख नम हो गई और उन्होंने मेरे सर पर हाथ रख कर मुबारकबाद दी और कहा मुझे ख़ुशी के साथ अफ़सोस है  आदिल रशीद कि ये शेर मुझे कहना चाहिए था.
मरहूम साहिल सहरी सच्चे शायर सच्चे इंसान थे उन्होंने कभी मुशायरे पढने के लिए जोड़ तोड़ की राजनीती नहीं की,कभी दाद हासिल करने के लिए अपने ही बन्दों द्वारा फरमाइश की पर्ची भेजने का भोंडा ढोंग भी नहीं किया वो अपने आप को संतुष्ट करने के लिए शेर कहते थे.अच्छे शेर कहने और सुनने का उन्हें जूनून था अक्सर रात के पिछले पहर उनका फोन आ जाता और हमेशा की तरह  वही एक जुमला होता "भाई  कोई अच्छा शेर सुना दो" जब  मैं अपना या अपने हाफ़िज़े में से किसी और का कोई अच्छा शेर उन्हें सुना देता तो एक लम्बी ठंडी सांस लेते हुए कहते अब नींद आ जायेगी वो अक्सर शेर कहने के लिए पूरी पूरी रात जागते  इसी लिए उन्होंने अपने एक शेर मे कहा भी कि  
ये हमसे पूछो के किस तरह शेर होते हैं
के हम सहर की अजानो के बाद सोते हैं
साहिल सहरी के उस्ताद कुंवर महिंदर सिंह बेदी "सहर" थे इसी लिए वो सहरी लिखते थे. साहिल सहरी कुंवर महिंदर सिंह बेदी "सहर" जिन्हें सब "आली जा " कहते थे के बेहद अज़ीज़ शागिर्द थे जिसका ज़िक्र आली जा ने यादो का जश्न में बड़ी ही मुहब्बत से किया है.जो लोग आली जा की ज़िदगी में आली जा से एक मुलाक़ात करने या आली जा का शागिर्द होने के लिए साहिल सहरी के आगे पीछे घूमते थे आली जा की आँखे बंद होते ही उन्ही लोगों ने साहिल सहरी  के पीछे से गाल बजाने शुरू कर दिए लेकिन उनके मरते दम तक उनके सामने नज़रे उठाने कि हिम्मत न कर सके.
 साहिल सहरी को हमेशा इस बात का गिला रहा के लोगों ने उनसे लिया तो बहुत कुछ मगर जो उनका हक था वो तक कभी नहीं दिया. कई ऐसे कच्ची  मिटटी के दीये जिन्हें साहिल सहरी ने आफ़ताब{सूरज जैसा प्रकाशमान} किया था मौक़ा पड़ने पर उन्होंने अपने मुहसिन{अहसान करने वाला} का हाथ जलाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी.
साहिल सहरी साहिब से यूँ तो मशवरा करने वालों कि गिनती बहुत ही जियादा है लेकिन चन्द  शागिर्द जिनका नाम साहिल सहरी साहिब बड़े ही फख्र से लेते थे उनमे ख्याल खन्ना कानपुरी,मशहूर नाजिम ऐ मुशायरा और शायर एजाज़ अंसारी दिल्ली,इकबाल आजर देहरादून,अमर साहनी फरीदाबाद वसी अहमद वसी फरुखाबाद,अबसार सिद्दीकी खटीमा शकील सहर एटवी, के नाम काबिले ज़िक्र हैं .
उनका एक ग़ज़ल संग्रह "सफ़र सफर है" 2005 में प्रकाशित होकर मशहूर हो चूका था और उनकी ज़िन्दगी में ही उनके अज़ीज़ शागिर्द इकबाल आजर साहेब के हाथो उनकी दूसरी किताब पर काम शरू हो चूका था जिसे अब फख्रे साहिल सहरी जनाब इकबाल आजर "कुल्लियाते साहिल सहरी " के नाम से मुरत्तब {संकलित}कर रहे हैं.जो जल्द ही प्रकाशित होगा 
साहिल सहरी को उर्दू हिंदी मे उनके योगदान के लिए अनेको सम्मान मिले दूरदर्शन आकाशवाणी ऍफ़ एम् चैनलों पर उनका कलाम प्रसारित हुआ तथा भारत और भारत से बाहर पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुआ        
एक समय पर मुशायरों पर राज करने वाला बड़ा शायर मुशायरे के माईक से शेर की तरह दहाड़ने वाला शायर {जिसकी नकल करके बहुत से शायर मुशायरों में बहुत कामयाब हुए} अपनी बढती उम्र के साथ रफ्ता रफ्ता मुशायरों से दूर होता गया और आखिरकार आज दुनिया से भी दूर हो गया लेकिन अगर वो चाहे भी तो साहित्य और साहित्य प्रेमियों के दिल से दूर नहीं हो सकता उनके कहे अशआर अदब पारों में हमेशा महफूज़ {सुरक्षित} रहेंगे  आदिल रशीद 9 जुलाई 2012 e-mail:
aadilrasheed.tilhari@gmail.com


साहिल सहरी अपने अज़ीज़ शागिर्द इकबाल आज़र के साथ आकाशवाणी के लिए एक प्रोग्राम की रिकार्डिंग के अवसर पर 

Friday, July 6, 2012

monsoon ne lee angdai aai pehli barish aai.poem the first rain by aadil rasheed tilhari

monsoon ne lee angdai aai  pehli barish aai.poem first rain by aadil rasheed tilhari

Thursday, July 5, 2012

पक गया दिल तरक्कियों से रशीद आओ बचपन की सिम्त चलते हैं आदिल रशीद پک گیا دل ترقیوں سے رشید آو بچپن کی سمت چلتے ہیں ..عادل رشید



पक गया दिल तरक्कियों से रशीद
आओ बचपन की सिम्त चलते हैं 
आदिल रशीद  
پک گیا دل ترقیوں سے رشید 
آو بچپن کی سمت چلتے ہیں
 
..عادل رشید 

Wednesday, July 4, 2012

दिल का रिश्ता ग़मों से जोड़ गया ख्वाब दिखला के उनको तोड़ गया उम्र भर सोचना है अब मुझको वो मुझे किस कमी पे छोड़ गया आदिल रशीद دل کا رشتہ غموں سے جوڈ گیا خواب دکھلا کے انکو توڑ گیا امر بھر سوچنا ہے اب مجھ کو وو مجھے کس کمی پی چھوڈ گیا عادل رشید --





दिल का रिश्ता ग़मों से जोड़ गया  
ख्वाब दिखला  के उनको तोड़ गया 
उम्र भर सोचना है अब मुझको 
वो मुझे किस कमी पे छोड़ गया 
आदिल रशीद
  دل کا رشتہ غموں سے جوڈ گیا 
خواب دکھلا کے انکو توڑ گیا 
عمر بھر سوچنا ہے اب مجھ کو 
 وہ  مجھے کس کمی پی چھوڈ گیا 
عادل رشید




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मुहब्बत बाल बच्चों और वतन की रोकती तो है ज़रुरत घर में पूरी हो तो हिजरत कौन करता है आदिल रशीद


Note: siyasat lafz jiska matlab hukumat,saltanat chalana hai wo to achhi baat hai lekin aaj kal logon ne iske bade gande matlab nikal liye hain.Do logon ke darmiyan badgumani paida karana,jojumle aapne nahin bhi kahe wo aapke naam se batana, logon ko aapas me ladwana aur tamasha dekhna is sher me "siyasat karne walon se" meri murad unhi zehni beemar logon se hai ..aadil rasheed

ये सच्ची बात कहने की जसारत कौन करता है
सियासत करने वालों से मुहब्बत कौन करता है
मुहब्बत बाल बच्चों और वतन की रोकती तो है
ज़रुरत घर में पूरी हो तो हिजरत कौन करता है
आदिल रशीद
जसारत=मर्दानगी,दिलेरी,जुर्रत,हिम्मत.
हिजरत=पलायन
یہ سچی بات کہنے کی جسارت کون کرتا ہے
سیاست کرنے والوں سے محبت کون کرتا ہے
محبت بال بچوں اور وطن کی روکتی تو ہے
ضرورت گھر میں پوری ہو تو ہجرت کون کرتا ہے
عادل رشید
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Tuesday, July 3, 2012

यहाँ से ले के वहाँ तक वकार उसका है जो है हुसैन का परवरदिगार उसका है.. आदिल रशीद —


yahan se le ke wahan tak waqaar us ka hai
jo hai husain ka parwardigar uska hai
aadil rasheed
یہا سے لے کے وہاں تک وقار اس کا ہے
جو ہے حسین کا پروردگار اسکا ہے
عادل رشید
यहाँ से ले के वहाँ तक वकार उसका है
जो है हुसैन का परवरदिगार उसका है
आदिल रशीद
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Sunday, July 1, 2012

I Love My India.हम जो हिन्दोस्तान से जाते बच गए नाक, कान से जाते आदिल रशीद ہ


हम जो हिन्दोस्तान से जाते 
बच गए नाक, कान से जाते 
आदिल रशीद 
ہم جو هندوستان سے جاتے
بچ گئے ناک، کان سے جاتے
عادل رشید

Saturday, June 30, 2012

शराब पीने से लीवर ख़राब होता है.....आदिल रशीद तिलहरी


ये बात सच है के अक्सर ख़राब होता है  
शराब पीने से लीवर  ख़राब होता है  
किसी से प्यार मुहब्बत तो ठीक है लेकिन
बिछड़ते वक़्त का मंज़र  ख़राब होता है  
आदिल रशीद तिलहरी 

Wednesday, June 27, 2012

तेरी तारीफ़ लिक्खूं भी तो आखिर किस तरह लिक्खूं नज़र जो देखती है वो कलम तो लिख नहीं सकता आदिल रशीद


तेरी तारीफ़ लिक्खूं भी तो आखिर किस तरह लिक्खूं
नज़र जो देखती है वो कलम तो लिख नहीं सकता
आदिल रशीद

تیری تعریف لکھوں  بھی تو آخر کس طرح لکھوں
نظر جو دیکھتی ہے وہ قلم تو لکھ نہیں سکتا
عادل رشید

wafa ka lafz to duniya ki har zaban me tha samajh me aaya hai abbas ke hawale se .....aadil rasheed


wafa ka lafz to duniya ki har zaban me tha
samajh me aaya hai abbas ke hawale se .....aadil rasheed

Thursday, November 10, 2011

इस व्लोग पर मेरी आखिरी पोस्ट ..आदील रशीद last post aadil rasheed

दोस्तो ये पोस्ट मैन ने e-kavita पर लिखी थी मैं उसे वैसा का वैसा ही यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ. लेकिन मैं इस व्लोग पर लिखूँगा नहीं इस व्लोग पर ये मेरी आखिरी पोस्ट होगी आगे से मैं अपनी पोस्ट www.aadil-rasheed-india.blogspot.com पर लिखूँगा..आदिल रशीद 


सोच जिनकी अपंग होती है....aadil रशीद


दोस्तों काफी वक़्त से आप तक कोई नयी पोस्ट नहीं पहुँच सकी कारण था मेरे सारे ब्लॉग जो इस  id  aadil .rasheed1967 
@gmail.com  से  बने  थे  वो डीलीट कर दिए गए है कमाल ये है के मुझे पता चल चुका है के किस ने डीलीट किये हैं उसका आई पी भी पता चल गया है जल्द ही उस पर कानूनी प्रक्रिया की जायेगी 
मैं आभारी हूँ श्री राजीव भरोल का जिन्होंने मेरी सहायता की मेरे जो लेख वहां थे वो सब उन्होंने कैसे कॉपी कर के पहुंचाए ये तो वो ही जान सकते हैं उनका मैदान है वो अमेरिका में ओर्कल मे कार्य करते हैं दक्ष हैं उनकी मदद से मुझे मेरी रचनाएँ मिल गयीं तथा  संसार में अच्छे लोग जियादा हैं इस बात पर मेरा विस्वास और जियादा मज़बूत हुआ है
जिसने डीलीट किये हैं वो कविमना दिमाग से अपाहिज हो चूका है  वो मुझसे और क़ानून से तो बेशक छुप जाए लेकिन अपने ज़मीर से कैसे छुपेगा.उसका ज़मीर उसको आज भी परेशान कर रहा होगा और हर रात सोने से पहले उस से यही सवाल पूछेगा के उसको क्या मिला ऐसा कर के क्यूँ के मुझे तो मेरी सामग्री मिल गई और जो मुझे पढ़ते हैं मुझसे प्रेम करते हैं वो लोग दोबारा फिर मुझ से जुड़ गए हैं और जो रह गए हैं रफ्ता रफ्ता वो भी जुड़ जायेंगे 
लेकिन उस से तो साइबर अपराध हो गया और जिस दिन ये भेद खुलेगा उस दिन वो समाज का सामना कैसे करेगा जिसके सामने वो एक कविमना का मुखोटा लगा कर आता है 

स्टीव जोब्स ने कभी किसी की साईट हैक नहीं की उसने भले छोटी उम्र पाई लेकिन सदियों पर भारी है उसकीउम्र .   रहती दुनिया तक लोग उसको याद करेंगे  कम से कम उस को स्टीव जोब्स की  जीवनी एक बार तो "दिल से " पढनी चाहिए 
कमाल (नीचता)की हद ये है के वो इस कायरता को अपने चमचों चम्चियों में बड़े फख्र से बताते भी होंगे के देखो मैं ने उसका ब्लॉग हैक कर दिया उसकी साईट हैक कर दी/डीलीट कर दी इस पर मैं तो एक बात कहता हूँ के 
"किसी को धोका देने के बाद ये नहीं सोचना चाहिए के आप चालाक कितने हैं बल्कि ये सोचना चाहिए के धोका खाने वाला आप पर कितना यकीन करता था"
आप इस बात का चर्चा करके अपनी महानता नहीं कायरता का बखान कर रहे हो  
 मुझे अपने करम फरमा मरहूम (स्वर्गीय) अहमद कमाल परवाज़ी का ये मतला आज बहुत याद आया 

जो ज़ख्म दे गए उन्हें गहरा तो मत करो
हम बेवकूफ हैं कहीं चर्चा तो मत करो


और अपने बहुत पुराने शेर आज बहुत याद आये 


 सोच जिनकी अपंग होती है 
 ऐसे लोगों का कुछ इलाज नहीं


अपाहिज सोच के मालिक हैं जितने 
उन्हें कुछ भी कहो मानव न कहना 


ऐसे अफाहिज सोच के लोगों को अगर आप सच बताना भी चाहो, समझाना भी चाहो तो वो सच स्वीकार नहीं करते बलके हक बयानी (सच बोलना) करने वालों को लिस्ट से ही डीलीट कर देते हैं 
उनके लिए मैं ने एक शेर कहा था 
ख्याल रखना ज़रा सी भी हकबयानी की
वो अपनी लिस्ट से तुमको डीलीट कर देगा 



मैं उसे मुज़फ्फर हनफी का ये शेर भी नहीं सुनाऊंगा

''आइना खाने मेरा चेहरा मुझे वापस कर 
वरना मैं हाथ बढ़ा सकता हूँ पत्थर की तरफ,,


क्यूँ के मैं अपनी ही किसी चीज़ को भीक में नहीं मांग  सकता हाँ कानून की शरण में ज़रूर जाऊंगा और जब वो मेरे ब्लॉग वापस कर देगा उसके बाद भी मैं उस पर कभी लिखूंगा कुछ नहीं लेकिन उससे ब्लॉग वापस ज़रूर लूँगा चाहें उस के लिए कितनी ही दूर क्यूँ न जाना पड़े क्यूँ के अब ये लड़ाई सत्य और असत्य की है सत्य असत्य की लड़ाई में सत्य सदा से ही असत्य को बेनकाब करता आया है मुझे विश्वास है यहाँ भी सत्य ही विजयी होगा.

दोस्तों आप लोगों का प्यार ही मेरी शक्ति है
और जो लोग तकनीकी रूप से निपुण हैं उनको लिखना चाहिए के कैसे हम अपने ब्लॉग को सुरक्षित कर सकते हैं 
अंत में एक बार फिर आपको कष्ट के लिए खेद  सत्यमेव जयते आदिल रशीद 



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Monday, October 17, 2011

जाओ जाओ तुम जैसे तीन सौ साठ(360) देखें हैं मैं ने



जाओ जाओ तुम जैसे तीन सौ साठ देखें हैं मैं ने शायद ही कोई हिंदी उर्दू बोलने वाला ऐसा हो जिस ने ये मुहावरा न बोला हो या न सुना हो 
इस मुहावरे का जन्म कहाँ से हुआ कैसे  हुआ इस्लामी ऐतबार से काबे मे तीन सौ साठ मन गढ़ंत  बुत थे जिनको उस समय तरह तरह से पूजा जाता था और ये मानना था के अगर इनकी पूजा न की जाए तो बहुत अनिष्ट(नुकसान) हो जाएगा बाद मे उनकी पूजा छोड़ कर एक ईश्वरवाद को स्वीकार(कुबूल) करते हुए लोगों ने अल्लाह को कुबूल किया और उसकी इबादत शरू की लेकिन उनका कोई अनिष्ट नहीं हुआ
मेरा अपना ख्याल है(जो गलत भी हो सकता है)  तभी से अरब मे ये जुमला किसी की  धमकी पर उस से न डरने को जताने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा होगा और जब माता हिंदी ने बेटी उर्दू को जन्म दिया और उर्दू जुबान बहुत मशहूर हुई तो उर्दू हिंदी मे भी ये मुहावरा खूब इस्तेमाल होने लगा   "जाओ जाओ तुम जैसे तीन सौ साठ देखें हैं मैं ने" देखें शेर 
"" खाक तुम हम को बनाओगे  मियां तुम जैसे 
   तीन सौ साठ हमें रोज मिला करते हैं""  आदिल रशीद 

Wednesday, October 12, 2011

जिस किसी दिन तुम उसूलों के कड़े हो जाओगे / aadil rasheed

जिस किसी दिन तुम उसूलों के कड़े हो जाओगे
बस उसी दिन अपने पैरों पर खड़े होजओगे
सच को समझाने की खातिर ये दलीलें ये जूनून
देख लेना एक दिन तुम चिडचिडे हो जाओगे
मैं महाज़े ज़िन्दगी पर सुरकरु हो जाऊंगा
तुम अगर मेरे बराबर मे खड़े हो जाओगे
कोई गैरतमंद मोहसिन खुद ब खुद मर जायेगा
सामने उसके जो तुम तनकर खड़े हो जाओगे
वो जहाँ दीदा था उसने इल्म यूँ आधा दिया
जानता था तुम बराबर से खड़े हो जाओगे
सब यहाँ अहले नज़र हैं क्या गलत है क्या सही
खुद को मैं छोटा कहूँ तो तुम बड़े हो जाओगे ?
मसनदे इन्साफ पर क्या दोस्ती क्या दुश्मनी
तुम खफा मुझ से अगर होगे पड़े हो जाओगे
बात मेरी गाँठ मे तुम बाँध लो इस दौर मे
काम तब होगा के जब सर पर खड़े हो जाओगे
जिस की गीबत कर रहे हो तुम सभी सर जोड़ कर
आया तो ताजीम मे उठ कर खड़े हो जाओगे
ज़ुल्म सहने की अगर आदत नहीं छोड़ी तो फिर
रफ्ता रफ्ता जेहन से तुम हीज्ड़े हो जाओगे
अहले तिलहर के लिए बच्चे ही हो आदिल रशीद
तुम ज़माने के लिए बेशक बड़े हो जाओगे आदिल रशीद

Thursday, October 6, 2011

उस अजनबी के लिए जिस से मेरा रिश्ता अज़ल से है...

हिन्दोस्तान मे जो चन्द शहर हैं जहाँ शायरी सुनी जाती है उनमे अलीगढ  की अपनी अलग हैसियत है.
अलीगढ़ मे मुशायरा पढना अपने आप मे एक ख़ुशी की बात है वहां ज़बान को समझने वाले लोग रहते हैं शेर को उसकी रूह तक जाकर समझते हैं और उस लफ्ज़ तक की दाद देते हैं जिस एक लफ्ज़ की वजह से वो शेर शेर होता है  मैं तो कहता हूँ के वहां निशस्त पढना किसी ऐसी जगह के मुशायरा पढने से लाख बेहतर है जहाँ शेर न सुने जाते हों बल्के मुशायरा देखा जाता हो.
मुशायरा पढने के बाद हमें न चाहते हुए कार उसी रस्ते पर डालनी पड़ी जिस से गए थे.
अलीगढ से बुलंद शेहर तक का जो रास्ता है  वो फिलहाल  हिंदुस्तान की रूह की तरह ज़ख़्मी है ऐसे ऊबड़ खाबड़ रास्ते पर कार से तेज़ तो साइकिल चलती है धूल इतनी के उस से जियादा तो कोहरे मे दिखाई देता है.
बार बार मुजीब साहेब की यही बात याद आ रही थी "आदिल भाई बाई रोड मत आना" अब बग़ैर नुकसान उठाये किसी ने किसी की मानी है आज तक  जो हम मानते हम भी गए बाई रोड ही.

हम गए तो बाया हापुड़ थे लेकिन अचानक ख्याल आया के बुलंदशहर से सिकंदरबाद होते हुए जल्दी देहली पहुँच जायेगे और उधर रास्ता भी बेहतर है.सिकंदराबाद मे सारे ट्रक और बस एक लाइन मे खड़े थे पता किया क्यूँ  भाई ये जाम कैसा जवाब मिला झांकियां  निकल रही हैं चोराहे पर हमारा ड्राइवर बहुत होशियार था(कुछ ज़रुरत से जियादा ही) गाडी को आगे बढाता गया बढाता गया बढ़ता गया और वहां तक बढाता गया जहाँ से अब गाडी वापस भी नहीं आ सकती थी मतलब न इधर के रहे न उधर के.
नश्तर ने मुझ से कहा के अल्लाह जाने  कहाँ तक जाम है सरकारी नौकरी की यही परेशानी है अब वक़्त पर कैसे पहुंचेंगे मैं ने हंस कर कहा दोस्ती बड़ी चीज़ है या नौकरी जवाब आया उबैस भाई और मुजीब भाई से मशवरा करके बताऊंगा(वो दोनों भी सरकारी मुलाजिम हैं )
फिर मैं गाडी से उतर कर बहुत दूर तक देखने गया जहाँ चौराहे पर झांकी निकल रही थी चौराहे पर जा कर देखा वहां चौराहे पर झांकी निकल कहाँ रही थी वो तो रक्खी थी (क्यूँ के अगर निकल रही होती तो अब तक निकल गयी होती) चौराहे पर जाम के कारण उधर की  गाड़ियाँ उधर इधर की इधर थीं  प्रशाशन गूंगा देख रहा था जब के इसको हेंडल किया जा सकता था लेकिन  नहीं किस की मजाल के उस जन सैलाब के सामने अपने अधिकारों का प्रयोग करे 
मैं ने देखा के एक अम्बुलेंस भी फँसी है उस मे एक मरीज़ ऑक्सीज़न लगा हुआ लेटा है और उसके रिश्तेदार गुमसुम हैं (शायद रोते रोते थक गए होंगे) उनको देहली AIIMS पहुंचना है उन्होंने बताया के उन्होंने बहुत फरियाद की के मरीज़ है इस गाडी को किस भी तरह निकल जाने दो मगर किसी ने हमारी मदद नहीं की  मैं एक अधिकारी के पास गया और उन से कहा के आप जाम खुलवाते क्यूँ नहीं जवाब वही जो मुझे पहले से पता था "धार्मिक मामला है हम जियादा ज़बरदस्ती नहीं कर सकते कुछ भी हो सकता है " 
मैं वापस आया और और नश्तर को सारी बात बताई फैसला किया गाडी यही छोडो किसी तरह वापस बुलंद शहर जाकर वहां से बाया हापुड़ चला जाए और फिर अचानक एक अजीब सी गाडी शायद "जुगाड़" वहां आई और उस ने आवाज़ लगानी शुरू की बुलंदशहर बुलंदशहर बुलंदशहर 
मुझे तो वो कोई अल्लाह का भेजा फ़रिश्ता नज़र आया मेरा एक शेर भी है जो में ने ऐसे ही किसी परेशानी के मौके पर किसी के मेरी मदद करने के बाद कहा था 
हमें अपने मसाइल का जो कोई हल नहीं मिलता 
बशक्ले आदमी वो इक फ़रिश्ता भेज देता है (आदिल रशीद 2001)
फिर उस जुगाड़ से बुलंदशहर तक और बुलंदशहर से बस से बाया हापुड़ देहली का सफ़र किया.उसी वक़्त किसी का भोपाल से SMS आया "लौट के बुद्धू घर को आये" और कोई वक़्त होता तो मैं बहत देर हँसता इस SMS पर लेकिन नहीं हंस सका मेरे दिमाग में तो वो मरीज़ और अमबुलंस घूम रही थी क्या हुआ होगा उसका क्या वो बचा होगा क्या उसके पास इतनी आक्सीजन थी क्यूँ के  जाम क्या पता कब खुला होगा क्या इतना समय दिया होगा ज़िन्दगी ने उस को. मेरी निगाह में मौत हमें जितनी मोहलत देती है उतने ही वक़्त को ही हम ज़िन्दगी कहते हैं .
मेरे दमाग में एक बात आती है के कोई भी धार्मिक या सियासी जुलूस निकालते वक़्त (यहाँ किसी विशेष धर्म की तरफ इशारा नहीं इसमें इस्लामी जुलूस भी हैं वो भी यही करते हैं) हम इंसानियत को क्यूँ भूल जाते हैं क्या हमें कोई भी धर्म इंसानियत को ज़ख़्मी करने की इजाज़त देता है क्या इस तरह के जुलूस धरने प्रदर्शन जो ज़िन्दगी को अस्त व्यस्त कर देते हैं  उस से इश्वर खुदा जो के एक ही के अलग अलग नाम हैं क्या वो खुश  होता है. 
रास्ते भर मैं उस अजनबी के लिए खुदा से दुआ करता रहा के खुदा उस अजनबी को इतनी साँसे और दे दे के वो अस्पताल पहुँच जाए क्युनके अगर वो अस्पताल नहीं पहुँच सका तो उसके रिश्ते दार सारी ज़िन्दगी यही सोच कर उन लोगों (जाम लगाने वालों)को मुआफ नहीं कर पायेंगे के काश जाम न होता और वो  वक़्त से अस्पताल पहुँच गए होते तो मरीज़ बच गया होता.......आदिल रशीद