Thursday, October 6, 2011

उस अजनबी के लिए जिस से मेरा रिश्ता अज़ल से है...

हिन्दोस्तान मे जो चन्द शहर हैं जहाँ शायरी सुनी जाती है उनमे अलीगढ  की अपनी अलग हैसियत है.
अलीगढ़ मे मुशायरा पढना अपने आप मे एक ख़ुशी की बात है वहां ज़बान को समझने वाले लोग रहते हैं शेर को उसकी रूह तक जाकर समझते हैं और उस लफ्ज़ तक की दाद देते हैं जिस एक लफ्ज़ की वजह से वो शेर शेर होता है  मैं तो कहता हूँ के वहां निशस्त पढना किसी ऐसी जगह के मुशायरा पढने से लाख बेहतर है जहाँ शेर न सुने जाते हों बल्के मुशायरा देखा जाता हो.
मुशायरा पढने के बाद हमें न चाहते हुए कार उसी रस्ते पर डालनी पड़ी जिस से गए थे.
अलीगढ से बुलंद शेहर तक का जो रास्ता है  वो फिलहाल  हिंदुस्तान की रूह की तरह ज़ख़्मी है ऐसे ऊबड़ खाबड़ रास्ते पर कार से तेज़ तो साइकिल चलती है धूल इतनी के उस से जियादा तो कोहरे मे दिखाई देता है.
बार बार मुजीब साहेब की यही बात याद आ रही थी "आदिल भाई बाई रोड मत आना" अब बग़ैर नुकसान उठाये किसी ने किसी की मानी है आज तक  जो हम मानते हम भी गए बाई रोड ही.

हम गए तो बाया हापुड़ थे लेकिन अचानक ख्याल आया के बुलंदशहर से सिकंदरबाद होते हुए जल्दी देहली पहुँच जायेगे और उधर रास्ता भी बेहतर है.सिकंदराबाद मे सारे ट्रक और बस एक लाइन मे खड़े थे पता किया क्यूँ  भाई ये जाम कैसा जवाब मिला झांकियां  निकल रही हैं चोराहे पर हमारा ड्राइवर बहुत होशियार था(कुछ ज़रुरत से जियादा ही) गाडी को आगे बढाता गया बढाता गया बढ़ता गया और वहां तक बढाता गया जहाँ से अब गाडी वापस भी नहीं आ सकती थी मतलब न इधर के रहे न उधर के.
नश्तर ने मुझ से कहा के अल्लाह जाने  कहाँ तक जाम है सरकारी नौकरी की यही परेशानी है अब वक़्त पर कैसे पहुंचेंगे मैं ने हंस कर कहा दोस्ती बड़ी चीज़ है या नौकरी जवाब आया उबैस भाई और मुजीब भाई से मशवरा करके बताऊंगा(वो दोनों भी सरकारी मुलाजिम हैं )
फिर मैं गाडी से उतर कर बहुत दूर तक देखने गया जहाँ चौराहे पर झांकी निकल रही थी चौराहे पर जा कर देखा वहां चौराहे पर झांकी निकल कहाँ रही थी वो तो रक्खी थी (क्यूँ के अगर निकल रही होती तो अब तक निकल गयी होती) चौराहे पर जाम के कारण उधर की  गाड़ियाँ उधर इधर की इधर थीं  प्रशाशन गूंगा देख रहा था जब के इसको हेंडल किया जा सकता था लेकिन  नहीं किस की मजाल के उस जन सैलाब के सामने अपने अधिकारों का प्रयोग करे 
मैं ने देखा के एक अम्बुलेंस भी फँसी है उस मे एक मरीज़ ऑक्सीज़न लगा हुआ लेटा है और उसके रिश्तेदार गुमसुम हैं (शायद रोते रोते थक गए होंगे) उनको देहली AIIMS पहुंचना है उन्होंने बताया के उन्होंने बहुत फरियाद की के मरीज़ है इस गाडी को किस भी तरह निकल जाने दो मगर किसी ने हमारी मदद नहीं की  मैं एक अधिकारी के पास गया और उन से कहा के आप जाम खुलवाते क्यूँ नहीं जवाब वही जो मुझे पहले से पता था "धार्मिक मामला है हम जियादा ज़बरदस्ती नहीं कर सकते कुछ भी हो सकता है " 
मैं वापस आया और और नश्तर को सारी बात बताई फैसला किया गाडी यही छोडो किसी तरह वापस बुलंद शहर जाकर वहां से बाया हापुड़ चला जाए और फिर अचानक एक अजीब सी गाडी शायद "जुगाड़" वहां आई और उस ने आवाज़ लगानी शुरू की बुलंदशहर बुलंदशहर बुलंदशहर 
मुझे तो वो कोई अल्लाह का भेजा फ़रिश्ता नज़र आया मेरा एक शेर भी है जो में ने ऐसे ही किसी परेशानी के मौके पर किसी के मेरी मदद करने के बाद कहा था 
हमें अपने मसाइल का जो कोई हल नहीं मिलता 
बशक्ले आदमी वो इक फ़रिश्ता भेज देता है (आदिल रशीद 2001)
फिर उस जुगाड़ से बुलंदशहर तक और बुलंदशहर से बस से बाया हापुड़ देहली का सफ़र किया.उसी वक़्त किसी का भोपाल से SMS आया "लौट के बुद्धू घर को आये" और कोई वक़्त होता तो मैं बहत देर हँसता इस SMS पर लेकिन नहीं हंस सका मेरे दिमाग में तो वो मरीज़ और अमबुलंस घूम रही थी क्या हुआ होगा उसका क्या वो बचा होगा क्या उसके पास इतनी आक्सीजन थी क्यूँ के  जाम क्या पता कब खुला होगा क्या इतना समय दिया होगा ज़िन्दगी ने उस को. मेरी निगाह में मौत हमें जितनी मोहलत देती है उतने ही वक़्त को ही हम ज़िन्दगी कहते हैं .
मेरे दमाग में एक बात आती है के कोई भी धार्मिक या सियासी जुलूस निकालते वक़्त (यहाँ किसी विशेष धर्म की तरफ इशारा नहीं इसमें इस्लामी जुलूस भी हैं वो भी यही करते हैं) हम इंसानियत को क्यूँ भूल जाते हैं क्या हमें कोई भी धर्म इंसानियत को ज़ख़्मी करने की इजाज़त देता है क्या इस तरह के जुलूस धरने प्रदर्शन जो ज़िन्दगी को अस्त व्यस्त कर देते हैं  उस से इश्वर खुदा जो के एक ही के अलग अलग नाम हैं क्या वो खुश  होता है. 
रास्ते भर मैं उस अजनबी के लिए खुदा से दुआ करता रहा के खुदा उस अजनबी को इतनी साँसे और दे दे के वो अस्पताल पहुँच जाए क्युनके अगर वो अस्पताल नहीं पहुँच सका तो उसके रिश्ते दार सारी ज़िन्दगी यही सोच कर उन लोगों (जाम लगाने वालों)को मुआफ नहीं कर पायेंगे के काश जाम न होता और वो  वक़्त से अस्पताल पहुँच गए होते तो मरीज़ बच गया होता.......आदिल रशीद

Saturday, October 1, 2011

७८६ अंक को शुभ क्यूँ माना जाता है....aadil rasheed

ये मेरा एक बहुत पुराना लेख है जो के कई समाचार पत्रों में प्रकाशित हो चूका है 


 ७८६ अंक को शुभ क्यूँ माना जाता है

याद कीजिये फिल्म दीवार का वो मंज़र अमिताभ के सीने पर गोली लगती और उन्हें कुछ नहीं होता गोली उनके बिल्ला नम्बर "786"  से टकरा कर बेकार हो चुकी है अमिताभ उस बिल्ले को कोट की जेब से निकाल कर चूमते हैं  फिर फिल्म कूली मे वही चमत्कारी  बिल्ला नंबर "786"  लगाते है   कूली मे एक जबरदस्त हादसे में  घायल होते है जिंदगी और मौत की जंग मे जीत ज़िन्दगी की होती है और वो रुपहले परदे पर भी और अपने वास्तविक जीवन मे भी अंक "786''  के ज़बरदस्त कायल हो जाते हैं और आज भी वह और उनका परिवार अंक "786" को अपने लिए शुभ मानता है

क्या है ये अंक 786 और क्यूँ मानते हैं इसको शुभ 

 एक अरबी भाषा का शब्द है "अबजद" जिसका एक मतलब होता हैं किसी बिद्या को सीखने की सब से पहली स्तिथि यानि अलिफ़,बे,ते (A.B.C.D.) क ख ग घ  सीखना


 जो दूसरा मतलब है वो अपने आप मे एक विद्या हैं किसी भी शब्द के नंबर निकालना ये अरबी की विद्या है इसलिए अरबी के तरीके से ही चलती है इसमें अरबी के हर अक्षर को एक गिनती दी हुई है किसी शब्द मे जो जो अक्षर प्रयोग होते हैं उन को गिन कर जोड़ कर जो योग निकलता है वही उस शब्द के अंक होते है आदिल रशीद को उर्दू मे लिखेंगे عادل رشید इसमें प्रयोग हुआ ऐन. अलिफ़ ,दाल, लाम, तो इस में 
ऐन के=70, अलिफ़ के =1 दाल के=4 लाम के=30 टोटल = 105 
इसी तरह रशीद रे के =200 शीन के =300 ये के =10 दाल के =4 टोटल=314 
आदिल रशीद के हुए 105 +314=419
इसी हिसाबे अबजद से बिस्मिल्लाह हिर रहमानिर रहीम जिसके अर्थ होते हैं "शुरू करता हूँ उस अल्लाह के नाम से  जो बेहद रहम वाला है"
अगर पुरे  वाक्य "बिस्मिल्लाह हिर रहमानिर रहीम" के अंक(नंबर) अबजद से निकालें तो बनेगे 786 इसी लिए मुस्लिम्स में  इसको लकी माना जाता है बहुत से लोग इसको नहीं भी मानते. 
 इस में हिन्दू मुस्लिम्स एकता का भी एक मन्त्र छुपा है अगर हम इसी तरह से " हरे कृष्णा" के निकालें तो भी निकलेंगे 786 दोनों के बिलकुल एक समान.
काश ये हमारे कुछ नेता गण समझ जाएँ  इश्वर एक है उसका सन्देश एक है मानवता सब से बड़ा धर्म है.

अरबी के सभी अक्षरों के नम्बर इस प्रकार हैं,
अलिफ़ =1,बे=2,जीम=3,दाल=4,हे=5,=वाओ=
6, ज़े=7,बड़ी हे =8,तूए के =9,ये =10
छोटा काफ =20,लाम=30,मीम=40,नून के =50,सीन=60,ऐन =70,फे=80,स्वाद =90,
बड़े काफ =100,रे =200,शीन =300,ते =400,से=500,खे=600,जाल -700,जवाद =800
जोए =900,गैन=1000,

अबजद के खेल में ताश जिसे इल्मी ताश कहा जाता है बच्चे इल्मी ताश खेलते है और आये हुए पत्तों से शब्द बनाते हैं  इस से उनका शब्द ज्ञान बढ़ता है 
हाज़िर है एक ग़ज़ल के चन्द शेर 

सब तो  बैठे हुए हैं मसनद पर 
हम ही ठहरे हुए हैं अबजद पर  

कल ही मिटटी से सर निकाला है
आज ऊँगली उठा दी बरगद पर 

आँख सोते मे भी खुली रखना 
सब की नज़रें लगीं हैं मसनद पर 

आज के दिन बटा था इक आँगन 
आज मेला लगेगा सरहद पर 


पहले उसने मेरे कसीदे पढ़े 
घूम फिर कर वो आया मकसद पर 


Wednesday, September 28, 2011

मुझे मालूम था इसको तो तुम पहचान ही लोगे...........



मुझे मालूम था इसको तो तुम पहचान ही लोगे...........
एक तस्वीर की कहानी...............आदिल रशीद /aadil rasheed

मेरे बहुत से फेसबुक के दोस्तों ने मुझ से बहुत बार ये कहा के आपने प्रोफाइल में  बहुत पुरानी(1986) की  B/W तस्वीर क्यूँ लगा रखी है और उसके नीचे C-824 वर्क चार्ज कालोनी कालागढ़ 1986  भी लिख रखा है
मैं ने कहा के इस के पीछे एक कहानी है (और मेरे हर शेर की एक कहानी होती है )
मेरा एक बदनाम शेर भी है
जो गुज़रती है बस वो कहता हूँ
वर्ना मेरा ग़ज़ल से क्या रिश्ता
जो भी पूछता के इसके पीछे क्या कहानी है तो मैं मुस्करा कर टाल जाता

और जियादा जिद करने पर कह देता के वक़्त आने पर बताऊंगा

बहुत से मित्र जो के मेरे बेहद करीब ( रग ए जाँ से भी करीब) हैं  वो इसकी कहानी जानते है जिनमे कुछ पुरुष मित्र है तो कुछ महिला मित्र भी है जिन्होंने ने  मेरा अनुसरण करते हुए अपनी अपनी वाल पर अपनी पुरानी तस्वीरें लगा रखी है
आज मैं इस को सब के लिए लिख रहा हूँ .

बात 1986 की है एक दिन अखबार में एक विज्ञापन देखा के एक फिल्म में कलाकारों का चयन हो रहा है २ रूपये  जी हाँ सिर्फ दो रूपये (१९८६ में २ रूपये बड़ी बात थी क्युनके उस वक्त पोस्ट कार्ड १० या १५ पैसे का था ) के डाक टिकट भेज कर फार्म मंगवा लें 
मैं ने २ रूपये के डाक टिकट भेज कर फार्म मँगा लिया फार्म भर कर भेजा तो यही तस्वीर जो मेरी फेसबुक की प्रोफाइल में है साथ में भेज दी 
तीन महीने बाद एक पोस्टकार्ड मिला आपका चयन मुख्य हीरो के रूप में हो गया है आप आ जाइये मेरी तो ख़ुशी का कोई ओर छोर न रहा एक दोस्त था प्रदीप चतुर्वेदी जिसे हम सब अमर उजाला कहते थे कोई बात पूरे कालागढ़ में फैलानी हो तो अखबार द्वारा तो वक़्त और पैसा दोनों लगते थे उसे बता दो फ्री में पूरे कालागढ़ में बात  फ़ैल जाती थी  (टी. वी उस समय हर घर मे था नहीं एक साधन था विविध भारती )बस क्या था उसे राज़ की बात बताते ही जिसे देखो वो सी-824 की तरफ भागा चला आ रहा था मुबारकबाद देने अम्मी अब्बू सबको चाय नाश्ता कराते और रुखसत करदेते.
धीरे धीरे वो दिन भी आ गया जब मुझे जाना था
एक बहुत बड़ा हुजूम(जन सैलाब) मुझे विदा करने बस अड्डे तक आया मेरा चेहरा फूलों के हारों में कही छुप गया था मैं उसको नहीं देख पा  रहा था जिसने मेरे साथ कभी पैसे बोये थे  क्युनके हम ने सुना था गेहूं बोने पर गेंहू उगते है यानि जो बोया जाए तो बही हु ब हूँ  निकलता है तो अगर पैसे बो दिए जाएँ तो पैसे ही उगेंगे
आज तो ये याद करके भी आँखें भर आती है और बहुत सी रेजगारी गालों पर गिरने लगती है (खैर जाने दो ) 

बस चली सफ़र पूरा कर के मैं वहां पहुंचा  उस दफ्तर में कुछ और भी  लड़कियां लड़के थे शायद सबको बुलाया गया था  
मुझे अन्दर बुलाया गया मैं अन्दर दाखिल हुआ सामने बैठा उन्होंने मुझे हैरत से देखा कहा ये तस्वीर आपकी है मैं ने कहा जी
उन्होंने एक दुसरे की तरफ देखा और कुछ खुसर फुसर की एक महिला जो बहुत ही सुन्दर थी बिलकुल मेरी माँ के जैसी गोरी गोरी चौड़ा माथा बड़ी बड़ी आँखें ममता का अथाह सागर और अम्मी की तरह भावुक भी क्युनके जो उसने कहा उसको वो बात कहने में बहुत तकलीफ हो रही थी उसका चेहरा उसकी  जुबां का साथ नहीं दे रहा था 
उसने बड़ी मुश्किल से कहा" देखिये हुआ यूँ के हम आपकी तस्वीर और चेहरे से धोका खा गए आपकी लम्बाई बहुत कम है 
मैं तो जैसे पहले ही भांप गया था (मेरी लम्बाई 5  फुट 1 इंच है )बस उसके कहने की प्रतीक्षा में था उनको नमस्ते की और चला आया मुझे चयन न होने का कोई दुःख नहीं था दुःख था तो ये के कितना उपहास उड़ेगा मेरा 
फिर मैं ने उसी दिन दो पोस्ट कार्ड लिखे एक घर पर और एक अमर उजाला को अब अमर उजाला को क्यूँ लिखा ये आप जानते ही हैं 

 और उसके ८ दिन बाद मैं कालागढ़ वापस आ गया मैं ने अपनी ज़िन्दगी का पहला कड़वा अनुभव किया के मुझे छोड़ने तो जन सैलाब आया था लेकिन लेने सिर्फ तीन आये थे शन्नू अमर उजाला और वो किसान जिसने मेरे साथ सिक्कों की बुआई की थी
 उसके बाद तो मेरा घर से निकलना फुटवाल खेलना सब दूभर हो गया सभी दोस्त उपहास उड़ाते जो मिलता लम्बाई बढ़ने के नुस्खे बताता किसी ने कहा दूध केला खाया कर किसी ने कहा लटका कर किसी ने करेले में मेथी उबाल कर (दोनों ही कितनी कडवी चीज़े है )पीने की सलाह दी वक़्त ने धीरे धीरे सारे ज़ख्म भर दिए 
वक़्त पंख लगा कर उड़ता रहा और हम सब धीरे एक दुसरे से जुदा होते गए शायद सरकारी परियोजनाओ में काम करने वालों का यही नसीब भी है के .इस दिल के टुकड़े हज़ार हुए कोई यहाँ गिरा कोई ...........
और वो बच्चे जिनके अभिवावक सरकारी कर्मचारी होते हैं और उनके अभिवावकों के तवादले होते रहते वो दोस्तों के बिछड़ने (उस उम्र की दोस्ती मेरी नज़र में बहत अहम् है  ) का गम झेलते रहते हैं और जीवन में कभी दोबारा नहीं मिलते 

लेकिन जब मैं ने फेसबुक पर खाता खोला तो मेरे दिमाग में वही चेहरे थे मुझे वक़्त ने कितना बदल दिया वो भी बदल गए होंगे लेकिन अगर आज भी  हम एक दुसरे के पास से गुज़र जाएँ तो न मैं ही पहचान पाउँगा न ही उन में से कोई मुझे पहचान पायेगा (और फिर अब मैं वो चाँद भी नहीं रहा अब तो मैं आदिल रशीद हूँ)लेकिन अगर उसवक्त के मेरे किसी दोस्त सहपाठी की तस्वीर मुझे दिखाई जाए तो मैं भी पहचान लूँगा और वो भी क्युनके हमारे जेहन पर एक तस्वीर बनी होती है जिसको हम ने आखरी बार जैसा देखा होता है वो हमारे जेहन पर वैसा ही अंकित होता है जब हम उसको दोबारा देखते है तब वो तस्वीर हट कर नयी तस्वीर उसकी जगह लेती है. इस विषय पर मेरा एक शेर है 
वो जब भी ख्वाब मे आये तो रत्ती भर नहीं बदले 
ख्यालों मे बसे चेहरे कभी बूढ़े नहीं होते 
बचपन पर मेरी एक पोस्ट और है उसके लिए लिंक ये है जो मेरे ब्लॉग पर है 
http://aadil-rasheed-hindi.blogspot.com/2010/11/kalagarh-ki-dhanterasaadil-rasheed.html

मैं जानता था के ये तस्वीर ज़रूर नज़र से गुजरेगी और जो मुझे आदिल रशीद के नाम से नहीं चाँद (जो मेरा  घर का नाम है ) के नाम से पहचानते हैं वो इस तवीर को पहचान लेंगे और सारे न सही एक दो भी अगर मिल जाएँ तो भी बहुत बड़ी बात होगी 
और खुदा का करम है के आज बहुत से लोग मुझे इस तस्वीर की वजह से मिल गए 
मैं चेहरे को नहीं बूढी निशानी लेके फिरता था 
मुझे मालूम था इस को तो तुम पहचान ही लोगे
 आदिल रशीद 

ऐसे ही बचपन के साथियों के लिए मेरे करम फरमा मरहूम अहमद कमाल परवाज़ी ने  कहा था
जो खो गया था कभी ज़िन्दगी के मेले मे
कभी कभी उसे आंसू निकल के देखते हैं

ऐसे ही दोस्तों के लिए अहमद फ़राज़ ने कहा  
ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे 
तू बहुत देर से मिला है मुझे 
हमसफ़र चाहिए हुजूम नहीं
इक मुसाफिर भी काफिला है मुझे

तो हाज़िर हैं वो तस्वीर जो अभी तक मेरी फेसबुक की प्रोफाइल में थी.



Saturday, September 17, 2011

ek khas sher... aadil rasheed

ये शेर सिर्फ एक शेर नहीं है. ये एक वादा है जो मैं ने अपनी शरीके हयात (पत्नि) से २ जून १९९९४ को किया था(यही हमारी शादी की तारिख है )
यूँ तो ये शेर मैं ने उस से बहुत पहले कहा था १९८९ में  मगर मैं ने ये शेर ना कहीं पढ़ा और ना ही कहीं छपवाया क्यूँ के मैं ने तय कर रखा था अपने दिल में के ये शेर मैं अपनी पत्नि को तोहफे में दूंगा .एक भावुक शायर को इस से अच्छा तोहफा कुछ समझ में नहीं आया क्यूँ के सोना चांदी तो सब देते हैं लेकिन एक उम्र के बाद उसको पहनता कौन है और ये भी है के आँख में आंसू न आने देने का वादा भी करना सितारों से मांग भरने से कहीं जियादा है किसी के वास्ते ताजमहल बना देने से भी कहीं जियादा है क्यूँ के औरत तो सिर्फ प्यार चाहती है सिर्फ प्यार उसको धन का लालच नहीं होता.
अब समझदार लोगों को ये बताने की क्या ज़रुरत हैं के एक औरत तो मुमकिन है के पेट में कोई बात रोक ले मगर एक शायर कवि  अगर इतने साल तक एक शेर दुनिया को सिर्फ इस लिए नहीं सुनाता अपने पेट में रोक कर रखता है के उस शेर को उसे अपनी शरीके हयात को तोहफे में देना है तो उस कवि  उस शायर ने पेट में  कितना दर्द कितनी तकलीफ सही होगी अंदाज़ा कीजिये.(काश उस दर्द का अंदाज़ा मेरी शरीके हयात भी कभी कर सके )
वो ही शेर हाज़िरे खिदमत है.........
आदिल रशीद  

Thursday, September 15, 2011

साहित्य मे चोरी/aadil rasheed

साहित्य मे चोरी ( भाग-1) आदिल रशीद 

कभी -कभी एक ही विषय पर दो कवि एक ही तरह से कहते हैं, उस को चोरी कहा जाए या इत्तिफाक ये एक अहम् सवाल है  आज कल तो ज़रा सा ख्याल टकरा जाने को लोग चोरी कह देते हैं और जिस व्यक्ति  के पास जितने अधिक शब्द हैं वो उतना ही बड़ा लेख लिख मारता है और स्वयंको बहुत बड़ा बुद्धिजीवी साबित करने की कोशिश मे लग जाता है  और बात को बहस का रूप दे देता है जब  के सत्य ये होता है के वो कवि या शायर चोर नहीं होता .
जब भी  कोइ साहित्य मे चोरी की बात करता है तो मैं कहता हूँ ये तवारुदहै और ये किसी के भी साथ हो सकता है खास तौर से नए शायर के साथ जिसने बहुत अधिक साहित्य न पढ़ा हो इसीलिए मैं कहता हूँ के कोई भी नया शेर कहने के बाद ऐसे व्यक्ति को जरूर सुनाना चाहिए जिस ने  बहुत सा साहित्य पढ़ा भी हो और उसे याद भी हो नहीं तो आपके तवारुद को दुनिया चोरी कहेगी
 तवारुद शब्द अरबी का है पुर्लिंग है इसके अर्थ  होते हैं एक ही चीज़ का दो जगह उतरना / एक ही ख्याल का दो अलग अलग कवियों शायरों के यहाँ कहा जाना   
तवारुद के हवाले से जो २  दोहे मैं उदाहरण के तौर पर रखता हूँ वो कबीर और रहीम के हैं  जो अपने अपने काल के महान कवि है 

वृक्ष कबहुँ नहि फल भखे, नदी न संचै नीर।
परमारथ के कारण, साधुन धरा शरीर।-कबीर(1440-1518

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान।-रहीम(1556-1627.

अब आते हैं मुख्य बात पर ये चोरी है या इत्तफाक:
तो उस ज़माने मे बात का किसी दुसरे के पास पहुंचना नामुमकिन सा था साधन नहीं थे T.V. net फोन अखबार उस समय एक बात दुसरे तक पहुँचने का कोई माध्यम नहीं था और अगर पहुँच भी जाए तो उसमे एक लम्बा और बहुत लम्बा समय लग जाता था इस लिए कबीर और रहीम के दोहों को  तावारुद का नाम दिया जायेगा और आज अगर ऐसा कोई वाकया  होता है तो इसको चोरी और सीना जोरी ही कहा जायेगा.क्युनके आज साधन बहुत हैं 
कवि ने चोरी की है या उस पर तवारुद हुआ है इस बात को उस कवि से बेहतर कोई नहीं जानता जिस ने ये किया होता है क्युनके आज हर बात नेट पर और पुस्तकों मे उपलव्ध है,और कविसम्मलेन और मुशायरे भी अधिक होते हैं समाचार पत्रों में पत्रिकाओ में रचना यहाँ से वहाँ पहुँच जाती है 

( लोग चोरी किस किस तरह करते हैं ये मैं अगले  लेखों  में लिखूंगा )


कविता लिखना और कविमना होना और कविमना होने का ढोंग करना अलग अलग बाते हैं  
कविमना तो वह व्यक्ति भी है जो कविता लिखना नहीं जानता ग़ालिब शराबी थे जुआरी थे वेश्याओं के यहाँ भी उनका आना जाना था उन पर अंग्रेजों के लिए मुखबरी के आरोप भी लगे हैं इन सब के बावजूद 
 उर्दू  शायरी मे ग़ालिब बाबा ए सुखन (कविता के पितामाह) हैं और रहेंगे. तो क्या वो कविमना नहीं थे
फिराक साहेब के बहुत से किस्से "मशहूर" हैं तो इससे उनके  कविमना होने पर उनके चिंतन पर क्या फर्क पड़ता है

एक बात और कहना चाहूँगा के सवाल तो हमेशा छोटा ही होता है जवाब हमेशा सवाल की लम्बाई (उसमे प्रयोग शब्दों की गिनती) से अधिक होता है.
Technicalities को सीखे बग़ैर तो कोई रचना हो ही नहीं सकती जैसे हम बीमार होने पर  झोला  छाप  डॉक्टर या BUMS के पास नहीं जाते  कम से कम उस रोग के माहिर या उस अंग  के माहिर के पास जाते हैं तो ये कहना ग़लत है के बिद्या से क्या.  लेख लिखना भी एक बिद्या है और उसके  अपने अलग फायदे हैं.

 इस्तिफादा और चर्बा(चोरी)
१ . अगर दोनों रचनाकारों के शेर का विषय वही है परन्तु शब्द दुसरे है तो इस्तिफादा कहलाता है यानि प्रेरणा.
२. अगर दोनों रचनाकरों के विषय भी वही है शब्द भी लगभग -लगभग वही हैं तो फिर तो वो चोरी ही हुई
३. अब ये कवि के कविमना होने पर है के वो कितना ईमानदार है और कितनी ईमानदारी से सत्य स्वीकार करता है कहीं वो  बात को छुपा तो नहीं रहा के साहेब मैं ने तो कभी ये शेर सुना ही नहीं.तो मैं कैसे चोर हो सकता हूँ.
३. साहित्य में ईमानदार (कविमना)होना पहली शर्त है.
4 . हम में विद्वान बनने  की होड़ होनी चाहिए किन्तु खुद को विद्वान या बुद्धिजीवी साबित करने की होड़ नहीं होनी चाहिए  
दुनिया में अभी ऐसी कोई तकनीक विकसित नहीं हुई जो झूठ को १०० % पकड़ सके. ये कवि के कविमना होने पर यानी उसकी इमानदारी पर ही है और उसकी इमानदारी पर ही रहेगा.
 मैं  यहाँ प्रेरणा और चोरी दोनों के उदहारण पेश कर रहा हूँ .
इस्तिफादा
मुझे हफीज फ़रिश्ता कहेगी जब दुनिया 
मेरा ज़मीर मुझे संगसार कर देगा (हफीज मेरठी)

खुद से अब रोज़ जंग होनी है
कह दिया उसने आइना मुझको (आदिल रशीद)

यहाँ दोनों ही  शेर  एक  ही  विषय  पर  हैं मगर दोनों  के शब्द अलग अलग हैं ये  प्रेरणा है  यहाँ हफीज मेरठी के शेर का  बिषय है के दुनिया मुझे फ़रिश्ता (कविमना ) कहेगी तो मेरा ज़मीर मुझे पत्थर मारेगा  के तू ऐसा तो है नहीं और दुनिया तुझे देवता(कविमना)  कहती है .
मेरे शेर में भी यही बात है  इस शेर में कहा गया है के उस ने  मुझे आइना यानि फ़रिश्ता ईमानदार (कविमना) कह दिया परन्तु मैं वैसा तो हूँ नहीं अब  इसी बात को लेकर मेरी खुद से जंग होनी है के या तो तू कविमना हो जा या फिर ज़माने को बता दे के तू पाखंडी है धोकेबाज़ है  
अगर मैं न बताऊँ तो कुछ लोग कभी नहीं जान पाएंगे के मैं ने इस शेर की प्रेरणा कहाँ से ली है
चर्बा (CHORI)
कटी पतंग का रुख मेरे घर की जानिब था 
उसे भी लूट लिया लम्बे हाथ वालों ने (आजर सियान्वी)

कटी पतंग मेरी छत पे किस तरह गिरती 
हमारे घर के बगल में में मकान ऊंचे थे (नामालूम, नाम लिखना उचित नहीं)


इसे हम चर्बा यानि चोरी क्यूँ कहेंगे इसलिए कहेंगे क्यूँ के यहाँ कटी पतंग भी है घर या छत भी है लम्बे मकान या लम्बे हाथ भी है और अर्थ भी वही है के कटी पतंग मुझे नहीं मिलेगी कारन भी लगभग लगभग वही है.



हमें ईमानदार होना चाहिए किसी दुसरे की अच्छी बात को अपने नाम से नहीं लिखना चाहिए सत्य को स्वीकार करना चाहिए क्यूँ के साहित्य में भी और जीवन में भी मौलिकता यानि सत्य  बहुत बड़ी चीज़ है
महान शायर अल्लामा इकबाल को यूँ भी महान कहा जाता है के उन्होंने हमेशा खुले मन से स्वीकार किया और खुद लिखा के उनकी मशहूर रचना "लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी " एक अंग्रेजी कविता का अनुवाद है अगर वो ज़माने को उस समय न बताते तो आज के इस नेट युग में सबको पता चल जाता के ये PREY OF CHILD से प्रेरित है उस स्तिथि मे उन पर चोरी का इलज़ाम लगता लेकिन उन्होंने उसी समय जब नेट का  विचार भी नहीं था अब से ५० साल पहले खुद लिख कर के ये एक अंग्रेजी कविता से प्रेरित है उसका अनुवाद है अपने को महान बना लिया.

बहुत से लोगो ने उर्दू हिंदी साहित्य में फारसी से कलाम चुराया है जो आज सब लोगों को पता चल गया है उस में बहुत से बड़े नाम हैं.चोरी औरझूठ ऐसी चीज़े है जो कभी छुपती नहीं हैं. इसी लिए कहा जाता है सत्यमेव  जयते  
अंत  में  हिंदी  दिवस  की  हार्दिक बधाई   
जय  हिंद  जय  भारत 
आदिल रशीद  


Monday, September 12, 2011

फैज़ अहमद फैज़ कि ज़मीन में एक तरही ग़ज़ल/faiz ahmad faiz ki zameen me ek tarahi ghazal/aadil rasheed


फैज़ अहमद  फैज़  कि  ज़मीन  में  एक  तरही ग़ज़ल 

जो  खून  ए  दिल  में  डुबो  ली  हैं  उँगलियाँ  मैं  ने  
लिखी  है  तब  कहीं  ज़ुल्मों  की  दास्ताँ  मैं  ने  

वहीँ  वहीँ  पे सजी  पाई  कहकशां  मैं  ने  
तुम्हारा  नाम  लिया  है  जहाँ  जहाँ  मैं  ने  

कहीं  मिले  ही  नहीं  फिर  वो  पुर  सुकुं  लम्हे  
उन्हें  तलाश  किया  है  कहाँ  कहाँ  मैं  ने  

मुझे  ये  दार ओ रसन उस का ही तो तोहफा है 
रखीं थी  नब्ज़  ए  ज़माना  पे  उँगलियाँ  मैं  ने  

हवा  के  साथ  में  कुछ  फिक्रें  भी  चली  आईं
ज़रा  सी  जेहन  की  खोली  जो  खिड़कियाँ  मैं  ने  

मिरा  वजूद  बिखर  जायेगा  पता  था  मुझे 
मगर  गुरूर  की  कर  दी   हैं  धज्जियाँ  मैं  ने  

ग़ज़ल  का  लहजा  मिरा  यूँ  भी  तल्ख़  है  आदिल 
पढ़ी  है  हजरते साहिर  की  "तल्खियाँ " मैं  ने 

दार ओ रसन= फांसी का फंदा,सलीब,फांसी का तख्ता
कहकशां= आकाश गंगा ,glaxy 
तल्ख़= कड़वा 
 तल्खियाँ साहिर लुधियानवी के ग़ज़ल संग्रह का नाम है

आदिल रशीद  

فیض احمد فیضؔ کی زمین میں ایک طرحی غزل

جو خون دل میں ڈبولی ہیں انگلیاں میں نے
لکھی ہے تب کہیں ظلموں کی داستاں میں نے

وہیں وہیں پہ سجی پائی کہکشاں میں نے
تمہارا نام لیا ہے جہاں جہاں میں نے

کہیں ملے ہی نہیں پھر وہ پر سکوں لمحے
انہیں تلاش کیا ہے کہاں کہاں میں نے

مجھے یہ دار و رسن اس کا ہی تو تحفہ ہے
رکھی تھیں نبض زمانہ پہ انگلیاں میں نے

ہوا کے ساتھ میں کچھ فکریں بھی چلی آئیں
ذرا سی ذہن کی کھولیں جو کھڑکیاں میں نے

مرا وجود بکھر جائے گا پتہ تھا مجھے
مگر غرور کی کر دی ہیں دھجیاں میں نے

غزل کا لہجہ مرا یوں بھی تلخ ہے عادلؔ 
پڑھی ہے حضرت ساحرؔ کی’’ تلخیاں‘‘ میں نے 

عادل رشید

faiz ahmad faiz ki zameen me ek tarahi ghazal

jo khoon e dil me dubo li hain ungliyan main ne 
likhi hai tab kahin zulmon ki dastan main ne 

wahin wahin pe saji payi kehkashan main ne 
tumhara nam liya hai jahan jahan main ne 

kahin mile hi nahin phir wo pur sukun lamhe 
unhen talash kiya hai kahan kahan main ne 

mujhe ye dar o rasan is baat ka hi to tohfa hai
rakhi thi nabz e zamana pe ungliyan main ne 

hawa ke saath me kuchh fikren bhi chali aayin
zara si zehn ki kholi jo khidkiyan main ne 

mira wajood bikhar jayega pata tha mujhe
magar guroor ki kar di hain dhajjiyan main ne 

ghazal ka lehja mira yun bhi talkh ha aadil
padhi hai hazrat e SAHIR ki "talkhiyan" main ne 
aadil rasheed


Friday, September 9, 2011

रज़ा महबूब की हम जैसे कुछ पागल समझते हैं /आदिल रशीद / aadil rasheed

रज़ा = मर्जी,इच्छा,   पीर =सोमवार 
रज़ा महबूब की हम जैसे कुछ पागल समझते हैं 
अगर वो पीर को मंगल कहे मंगल समझते है

जो  तुझ  से  दूर  हो  वो  जिंदगी  भी  जिंदगी  कब  है  
जो तेरे साथ में गुज़रे उसी को पल समझते हैं 


किसी ने यूँ ही वादा कर लिया था पीर मंगल का 
उसी दिन से हर इक दिन पीर और मंगल समझते हैं

उन्हें  तो हुक्म की तामील हर हालत मे करनी है  
कहाँ कितना बरसना है ये क्या बादल समझते हैं 


ये जनता सब समझती है के उनकी खूबियाँ क्या हैं 
मगर वो हैं के सब को अक्ल से पैदल समझते हैं
  
कहाँ हैं पहले जैसी खासियत के लोग दुनिया मे
जो नकली सांप हैं  कीकर को भी संदल समझते हैं
राजा = मर्जी,इच्छा, पीर =सोमवार  

 

raza mehboob ki ham jaise kuchh pagal samajhte hain
agar wo peer ko mangal kahen mangal samajhte hain

jo tujh se door ho wo zindagi bhi zindagi kab hai
jo tere saath me guzre usi ko pal samajhte hain

kisi ne yun hi wada kar liya tha peer mangal ka
usi din se har ik din peer aur mangal samajhte hain

unhe to hukm ki tameel har halat me karni hai
kahan kitna barasna hai ye kya baadal samjhte hain

ye janta sab samajhti hai ke unki khoobiyan kya hain
magar wo hain ke sab ko aqal se paidal samajhte hain

kahan hain pehle jaisi khasiyat ke log duniya me
jo naklee saanp hain keekar ko bhi sandal samajhte hain

१२ मई 1994




Thursday, September 8, 2011

भरम उसकी शराफत का न खुल जाए वो डरता है /aadil rasheed

भरम  उसकी  शराफत  का  न  खुल  जाए  वो  डरता  है
सहारा  ले  के  गैरों  का  वो  मुझ  पर  वार  करता  है

समझ  में  आ  सकेगा   किस  तरह  ये  मसअला यारो 
जो  शब्  का  क़त्ल  होता   है  तो  इक  सूरज  उभरता  है


कोई  तद्फीन  हो  घर  में , किसी  अपने की  शादी  हो
ये  मत  पूछो  वो  दिन  परदेस  में  कैसे  गुज़रता  है

मिरे  अशआर  कुछ  लोगों  को  खुद  पर  तन्ज़  लगते  हैं 
जहाँ  पर  गड्ढा  होता  है  वहीँ  पर  पानी  मरता  है

तद्फीन = मुर्दा दफ्न करना, अंतिम क्रिया
अशआर = शेर का बहुवचन 
शब् = रात 

तन्ज़ =व्यंग   

bharam uski sharafat ka na khul jaaye wo darta hai
sahara le ke gairon ka wo mujh par waar karta hai

samajh men aa sakega kis tarah ye masala yaaro
jo shab ka qatl hota hai to ik sooraj ubharta hai


koi tadfeen ho ghar men, kisi apne ki shaadi ho
ye mat poochho wo din pardes men kaise guzarta hai

mire ashaar kuchh logon ko khud par tanz lagte hain
jahan par gaddha hota hai wahin par pani marta hai






Monday, September 5, 2011

जो बन संवर के वो एक माहरू निकलता है /आदिल रशीद /aadil rasheed

जो बन संवर के वो एक माहरू निकलता है
 

तो हर ज़बान से  बस अल्लाह हू निकलता है
 

ये चाँद रात ही दीदार का वसीला है

बरोजे ईद ही वो खूबरू निकलता है


हलाल रिज्क का मतलब किसान से पूछो

पसीना बन के बदन से लहू निकलता है


ज़मीन और मुक़द्दर की एक है फितरत

के जो भी बोया वही  हूबहू  निकलता है



तेरे बग़ैर गुलिस्ताँ को क्या हुआ आदिल
जो गुल निकलता है बे रंगों बू  निकलता है 

आदिल रशीद 






माहरू= सुन्दर चाँद जैसे चेहरे वाला
अल्लाह हू = हे भगवान् 

रिज्क= रोजी,रोटी   

आदिल रशीद 



Saturday, August 13, 2011

आज रक्षा बंधन है अपनी उन तमाम बहनों के लिए जो मुझ से दूर हैं / आदिल रशीद



एक शेर ........

बड़े नादान हो राखी को तुम राखी ही कहते हो


तुम्हे मालूम है क्या क्या बंधा है इसके धागों में


बताओ तुम हमें क्या खून का रिश्ता ही रिश्ता है


बहुत से ग़ैर बंध जाते हैं इसके कच्चे धागों में


आदिल रशीद


13-08 -2011









bade nadan ho rakhi ko tum rakhi hi kehte ho


tumhe maloom hai kya kya bandha hai iske dhago me 


batao tum hame kya khoon ka rishta hi rishta hai
bahut se gair bandh jate hain iske kachche dhagon me 
aadil rasheed






Wednesday, May 18, 2011

हम जो हिन्दोस्तान से जाते / ham jo hindostan se jaate /aadil rasheed

हम जो हिन्दोस्तान से जाते 
बच गए नाक कान  से जाते 

बेवफा होना क्या ज़रूरी था 
किस ने रोका था शान से जाते 

आप हम को अगर नहीं मिलते 
हम तो कोरे जहान से जाते 

हाँ में हाँ ने बचा लिया हमको
सच जो कहते तो जान से जाते 










Wednesday, May 4, 2011

योमे मजदूर/ मजदूर दिवस /लेबर डे/ labour day /aadil rasheed

 योमे मजदूर/ मजदूर दिवस /लेबर डे/ labour day /aadil rasheed
खोखले नारों से दुनिया को बचाया जाए
आज के दिन ही हलफ इसका उठाया जाए
जब के मजदूर को हक उसका दिलाया जाए
योमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए

ख़ुदकुशी के लिये कोई तो सबब होता है
कोई मर जाता है एहसास ये तब होता है
पेट और भूक का रिश्ता भी अजब होता है
जब किसी भूके को भर पेट खिलाया जाए
योमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए

अस्ल ले लेते हैं और ब्याज भी ले लेते हैं

कल भी ले लेते थे और आज भी ले लेते हैं
दो निवालों के लिए लाज भी ले लेते हैं
जब के हैवानों को इंसान बनाया जाये
योमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए

बे गुनाहों की सजाएं न खरीदीं जाएँ

चंद सिक्कों में दुआएं न खरीदी जाएँ
दूध के बदले में माएं ना
खरीदी जाएँ
मोल  ममता का यहाँ जब न लगाया जाये
योमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए 

अदलो आदिल कोई मजदूरों की खातिर आये
उनके हक के लिए कोई तो मुनाजिर आये
पल दो पल के लिए फिर से कोई साहिर आये
याद जब फ़र्ज़ अदीबों को दिलाया जाये
योमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए
हलफ= बीडा उठाना ,कसम उठाना 
सबब= कारण
अदल  = कानून, 
आदिल= इन्साफ करने वाला
मुनाजिर= बहस करने वाला
साहिर= साहिर लुधियानवी जिस ने खुद को पल दो पल का शायर कहा और मजदूरों की हक बात अपनी शायरी में की
अदीबों= कवि शायर पत्रकार का बहुवचन
             जय हिन्द



 

Tuesday, December 14, 2010

शीला की जवानी तीसमारखां/sheela ki jawani /teesmarkhan/

शीला की जवानी तीसमारखां 
बात थी चन्द ही महीनों की
ये खबर आम ही नहीं होती
शीला पहले जवान हो जाती
मुन्नी बदनाम ही नहीं होती
bat thi chand hi mahinoN ki 
ye khabar aam hi nahiN hoti
sheela pehle jawan ho jaati 
munni badnam hi nahiN hoti 
                      aadil rasheed 
                        new delhi 
AADILRASHEED1967@GMAIL.COM




Thursday, November 25, 2010

हिदुस्तानियों के नाम एक नज़्म पैग़ाम/aadil rasheed

    
 एक नज़्म पैग़ाम(सन्देश)  
चलो पैग़ाम दे अहले वतन को
कि हम शादाब रक्खें इस चमन को
न हम रुसवा करें गंगों -जमन को
करें माहौल पैदा दोस्ती का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का


कसम खायें चलो अम्नो अमाँ की
बढ़ायें आबो-ताब इस गुलसिताँ की
हम ही तक़दीर हैं हिन्दोस्ताँ की
हुनर हमने दिया है सरवरी का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का

ज़रा सोचे कि अब गुजरात क्यूँ हो
कोई धोखा किसी के साथ क्यूँ हो
उजालों की कभी भी मात क्यूँ हो
तराशे जिस्म फिर से रौशनी का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का

न अक्षरधाम, दिल्ली, मालेगाँव
न दहशत गर्दी अब फैलाए पाँव
वतन में प्यार की हो ठंडी छाँव
न हो दुश्मन यहाँ कोई किसी का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का


हवाएँ सर्द हों कश्मीर की अब
न तलवारों की और शमशीर की अब
ज़रूरत है ज़बाने -मीर की अब
तक़ाज़ा भी यही है शायरी का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का

मुहब्बत का जहाँ आबाद रक्खें
न कड़वाहट को हरगिज़ याद रक्खें
नये रिश्तों की हम बुनियाद रक्खें
बढ़ायें हाथ हम सब दोस्ती का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का


यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का
यही मक़सद बना लें ज़िन्दगी का
जय हिंद!
आदिल रशीद
Aadil रशीद
NEW DELHI
9810004373   
9811444626




आज का बीते कल से क्या रिश्ता /aaj ka beete kal se kya rishta/aadil rasheed


आज का बीते कल से क्या रिश्ता
झोपड़ी का महल से क्या रिश्ता

हाथ कटवा लिए महाजन से
अब किसानों का हल से क्या रिश्ता

सब ये कहते हैं भूल जाओ उसे
मशवरों का अमल से क्या रिश्ता

किस की ख़ातिर गँवा दिया किसको
अब मिरा गंगा-जल से क्या रिश्ता

जिस में सदियों की शादमानी हो
अब किसी ऐसे पल से क्या रिश्ता

जो गुज़रती है बस वो कहता हूँ
वरना मेरा ग़ज़ल से क्या रिश्ता

ज़िंदा रहता है सिर्फ़ पानी में
रेत का है कँवल से क्या रिश्ता

मैं पुजारी हूँ अम्न का आदिल
मेरा जंग ओ जदल से क्या रिश्ता
फारसी  अरबी शब्दों के लिए क्लिक करें

जंगो जदल/jango jadal/جنگ و جدل/ شادمانی/ शादमानी/ shadmaani/shaadmani  

Friday, November 19, 2010

अपने हर कौल से, वादे से पलट जाएगा..

ग़ज़ल
अपने हर कौल से, वादे से पलट जाएगा
जब वो पहुंचेगा बुलंदी पे तो घट जाएगा

अपने किरदार को तू इतना भी मशकूक न कर
वर्ना कंकर की तरह से दाल से छट जाएगा

जिसकी पेशानी तकद्दुस  का पता देती है
जाने कब उस के ख्यालों से कपट जाएगा

उसके बढ़ते हुए क़दमों पे कोई तन्ज़ न कर
सरफिरा है वो,  उसी वक़्त पलट जाएगा

क्या ज़रूरी है के ताने रहो तलवार सदा
मसअला घर का है बातों से  निपट जाएगा

आसमानों से परे यूँ तो है वुसअत उसकी
तुम बुलाओगे तो कूजे में सिमट जाएगा  
 उर्दू अरबी फारसी शब्दों के अर्थ के लिए, क्लिक करें  





e-mail=AADILRASHEED67atGMAIL.COM

Tuesday, November 16, 2010

आज बकरा ईद है /eid-e- Adha/eid-ul-adha/eid-ul-zuha

आज ईद उल ज़हा (बकरा ईद) है यानि मुस्लिम्स मे कुर्बानी करने का दिन
मेरे  बहुत  से  मित्र अक्सर ये सवाल करते हैं के ये  कुर्बानी क्यूँ करते हैं ये सही है या नहीं है वगैरा-वगैरा
इसके सम्बन्ध मे बहुत कुछ लिखा और पढ़ा जा चूका है अब कुछ कहने को शेष नहीं बैसे बात को रबड़ की तरह कितना ही खेच लो उस से क्या
हाँ एक बात अक्सर कही जाती है के मुस्लिम्स मांसाहारी होते हैं और हिन्दू शाकाहारी तो ऐसा क्यूँ , मुस्लिम्स उलटे तवे पर रोटियां क्यूँ पकाते हैं , मुस्लिम्स की रोटियां बड़ी क्यूँ होती है , मुस्लिम्स उलटे हाथ क्यूँ धोते हैं ,मुस्लिम्स डूबते सूरज को अच्छा क्यूँ समझते हैं ,मुस्लिम्स ज़मीन मे मुर्दा क्यूँ दफनाते हैं जलाते क्यूँ नहीं ,मुस्लिम्स दोपहर मे मुर्दा क्यूँ नहीं दफनाते हैं   ,मुस्लिम्स की तारीख सूरज डूबने पर क्यूँ बदलती है वगैरा -वगैरा
आज सोचता हूँ के इस पर कुछ लिखने की कोशिश की जाए

Wednesday, November 3, 2010

कालागढ की धनतेरस/ kalagarh ki dhanteras/aadil rasheed




कालागढ की धनतेरस/ kalagarh ki dhanteras/aadil rasheed

कालागढ की धनतेरस
कालागढ वर्क चार्ज कालोनी गूरू द्वारे के और डाक खाना के पास ही सहोदर पनवाडी की दुकान थी जहाँ  मै आदिल  रशीद उर्फ़ चाँद, और मेरे बचपन के दोस्त शमीम,शन्नू,असरार फास्ट बोलर,संजय जोजफ़,जाकिर अकेला,सलीम बेबस,रमेश तन्हा,राजू,यूसुफ़,शिवसिंह,गौरी,काले,अरविन्द,शीशपाल,नरेश,करतार,सभी जमा होते थे,और हमारी एक अलग भाषा थी तुफुनफे उफुस नफे सफे ....सब बुज़ुर्ग हमारा मुंह देखते हम खूब मजाक करते,चांदनी रातों में पहाड़ों का हुस्न कोई शब्दों में बयान नहीं कर सकता उसे तो बस महसूस किया जा सकता है ,वही दौर वी सी आर  का शुरूआती दौर भी था  50  पैसे में नई से नई फिल्म ज़मीन पर बैठ कर और एक रूपये  में बालकोनी में यानि छ्त से बैठकर. सहोदर की दुकान ही  सारी प्लानिंग का अड्डा थी वही से सब ख़बरें मिला करती थी कहाँ क्या हुआ ,कहाँ क्या होगा ,सहोदर कि दुकान के बगल में ही रात को  भजन कीर्तन पुरबिया गीतों कि महफ़िल जमती और जब सुकुमार भैया और शारदा भौजी बिरहा गाते तो मन हूम-हूम करता उस समय यही मनोरंजन का साधन था और दिन में टोनी के टेलीवीजन (जो पूरी कालोनी में इकलोता टी वी था और सउदी अरब से टोनी का भाई लाया था ) पर इंडिया पाकिस्तान का मैच चलता तो २५-३० फुट ऊँचा बांस पर एंटीना लगा होता और झिलमिलाती हुई तस्वीर को साफ़ कने कि नाकाम कोशिश में पूरा दिन निकल जाता....अरे -अरे थोडा बाएं थोडा सा दायें बस बस अरे पहले साफ़ था अब और ख़राब होगया  अब दूसरा तीस मार खां   जाता हट तेरे बस का कुछ नहीं मैं करता हूँ और चार चार महारथी एक साथ देख कर भी उस टीवी रुपी मछली कि आँख न भेद पाते और शाम हो  जाती  
सहोदर की दुकान से धन्नो का मकान साफ़ नज़र आता था,और एक रास्ता पूनम के घर की तरफ़ जाता था बाद मे राजू की शादी पूनम से हुई दोस्तो की देर रात तक महफ़िल जमतीं थी,रात को सब अपने-अपने परिवार के साथ घूमने निकलते थे,लडकियाँ बहुए और भाभीयाँ एक साथ हो जाती थी,बूढे अलग जवान अलग,देर रात तक क्लब के अन्दर और मैदान मे डेरा रहता फ़िर सब वापस आते दुर्गा पूजा,रामलीला के दिनो मे तो जैसे बहार ही आ जाती थी इन ही दिनो का तो साल भर इन्तजार रहता था मुझे आज भी याद है के दुर्गा पूजा और रामलीला के बाद धनतेरस आती अम्मी और अब्बु धनतेरस पर खूब खरीदारी करते कई बार कुछ तंग जहन मुस्लिम्स ने टोका भी के अब्दुल रशीद साहेब धनतेरस पर आप खरीदारी क्यूँ करते हैं ये इस्लाम के खिलाफ़ है अब्बू सिर्फ़ मुस्करा देते एक धनतेरस पर अब्दुल्लाह साहेब ज़िद ही पकड गये और कई मुस्लिम दोस्तो के साथ अब्बू को शर्मीन्दा करने पर आमादा हो गये तो अब्बू ने मुस्कराते हुए जवाब दिया के पूरी कालोनी इस दिन खरीदारी करती है बच्चे कितनी बेसब्री से इस दिन का इन्तज़ार करते है इन मासूमो का दिल दुखाना मेरे बस की बात नही बच्चो को बच्चा ही रहने दें इन के ज़ह्नो मे हिन्दू मुस्लिम का ज़हर न घोलें मुझे खूब याद है दीपावली की रात एक दुसरे को तोहफे देते समय आँखे नम हो जाती थीं पता नही अगले साल हम यहाँ रहेगे या तबादला हो जायेगा क्यूँ के  वहाँ सब परदेसी थे सरकारी मुलाजिम थे और बिछडने का खौफ़ हमेशा रहता था वहाँ धर्म जाति का आडम्बर नही था शिया सुन्नी का झगड़ा भी नहीं था किसी का किसी से खून का रिश्ता भी नही था मगर एक बेशकीमती रिश्ता था मुहब्बत का रिश्ता, अपनेपन का रिश्ता मुझे हर धनतेरस पर बहुत से चेहरे हू ब हू बैसे ही याद आ जाते हैं जैसे वो उस समय थे  उन मे से बहुत से तो अब इस दुनिया मे भी नही होंगे (देखें नोट) और बहुत से मेरी ही तरह बूढापे की दहलीज़ पर होगे मगर खयालो मे वो आज भी वैसे ही आते हैं जैसा मैने उन को  आखिरी  बार देखा था ...... मै अपने ये शेर उन को समर्पित करता हूँ

वो जब भी ख्वाब मे आये तो रत्ती भर नहीं बदले
ख्यालों मे बसे चेहरे कभी बूढे नहीं होते

ज़रा पुरवाई चल जाए तो टांके टूट जाते हैं
बहुत से ज़ख्म होते है, कभी अच्छे नहीं होते

हमारे ज़ख्म शाहिद हैं के तुम को याद रक्खा है
अगर हम भूल ही जाते तो ये रिसते नहीं होते

कई मासूम चेहरे याद आये
किताबों से जो पर तितली के निकले 

नोट १.जैसे सरिता भाभी नीता भाभी कविता दीदी,रजनी दीदी, जगदीश भैया,सहोदर भैया सुकुमार भैया ,शारदा भौजी , हमारी उम्र उस वक़्त १२ वर्ष कि थी और इन सब कि लगभग ३०-३५
२.  चोबे अंकल,किशन अंकल,शर्मा अंकल ,सक्सेना अंकल,वर्माजी , रावत अंकल, नथानी अंकल, गोस्वामी अंकल,शकूर चाचा रमजानी,अब्दुल्लाह चच्चा,नसीम चच्चा,पुत्तन चच्चा,मिर्ज़ा जी रिज़वी साहेब,तमन्ना अमरोहवी साहेब,सिद्दीकी ठेकेदार,ज़फीर ठेकेदार, नकवी साहेब(C-855) दुसरे नकवी साहेब हैडिल कालोनी थोमस अंकल जोसेफ अंकल,सरदार परमजीत पम्मी और बहुत से अब्बू के दोस्त और अम्मी की सहेलियां    

............आदिल रशीद ०३/११/२०१०
शाहिद= गवाह,
मेरा जन्म C-824,वर्क चार्ज कालोनी कालागढ़ में हुआ घर में सब चाँद कहते थे , अब्बू का नाम अब्दुल रशीद, बड़े भाई का नाम खलील अहमद ,उसके बाद तौफीक अहमद,छोटा भाई रईस छुट्टन बहन किसवरी,मिसवरी,और कौसर परवीन
भाई साहेब खलील के दोस्त रज्जन,प्रदीप शॉप नो.४,मुन्ना ठेकेदार,सलाउद्दीन नाई,

Monday, November 1, 2010

क्या लिक्खूं उनको मुश्किलें अलकाब मे भी हैं /aadil rasheed/

क्या लिक्खूं उनको मुश्किलें अलकाब मे भी हैं
महताब लिक्खूं , दाग़ तो महताब मे भी हैं

उपजाऊ मिटटी मिलती है बंजर ज़मीन को
सोचो अगर तो फायदे सैलाब मे भी हैं

दुनिया के साथ अपना टू लहजा बदल के देख

गर ऐब हैं,  तो खूबियाँ तेजाब में भी है

कहने को पांच -पांच नदी बहती हैं मगर
महरूम-ए-आब खेत तो पंजाब मे भी है

मुश्किल है मैं हूँ आप की फितरत से आशना
पोशीदा राज़ आपके आदाब मे भी हैं

अलकाब =सम्बोधन  का बहुवचन
महताब = चाँद 
महरूम-ए-आब= पानी से वंचित,पानी से महरूम

पोशीदा= छुपे हुए

Saturday, October 30, 2010

दो शेर /आदिल रशीद /aadil rasheed

दो शेर 
आज निपटे हैं ज़िम्मेदारी से आज से 
आज से तुम को याद करना है 
जिन्दगी की उलझनों ने मुझे इतना वक़्त नहीं दिया के मैं तुम्हे उस एहतमाम से याद कर सकूं, उस तरह याद कर सकूं जिस तरह याद किया जाना तुम्हारा हक है मुझ पर  मै  आज ज़िन्दगी की तमाम उलझनों से आज़ाद हूँ आज मैं वाकई तुम्हे उस तरह याद कर सकता हूँ  सच्चे दिल से ............................याद करने का अभिनय नहीं

पहले फरयाद उन से करनी है 
फैसला उसके बाद करना है
 पहले रिश्ता बहाल करने की  इल्तिजा ,फरयाद गुज़ारिश, बीते खुशनुमा दिनों का  हवाला,वास्ता यानि  हर मुमकिन कोशिश के किसी तरह रिश्ता बहाल रहे ,और जब कोई रास्ता न बचे तो फिर हार के बे मन से एक गम्भीर फैसला यानि तर्के ताल्लुक
आदिल रशीद